‘करो या मरो’ था आजादी का संकल्प, जिसने हिला दी अंग्रेजी हुकूमत की नींव : डॉ. अनिल दीक्षित

अगस्त क्रांति की 84वीं वर्षगांठ पर भारत छोड़ो आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका पर हुई गोष्ठी
वक्ताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और युवाओं की भूमिका पर रखे विचार
देहरादून। अगस्त क्रांति के ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ पर रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के तत्वावधान में गोष्ठी का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने भारत की आजादी के लिए महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए आंदोलन, स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और वर्तमान पीढ़ी के लिए इसके महत्व पर विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि भारत की आजादी हजारों देशभक्तों के संघर्ष और सर्वोच्च बलिदान का परिणाम है, इसलिए नई पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और उसके मूल्यों से परिचित कराना जरूरी है।
गोष्ठी को संबोधित करते हुए , डीन लॉ, देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी ने स्वतंत्रता संग्राम के सभी अमर शहीदों को नमन करते हुए कहा कि अगस्त क्रांति का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान, जिसे अब अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाता है, से महात्मा गांधी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ निर्णायक संघर्ष का आह्वान किया था।
डॉ. दीक्षित ने कहा कि इसी आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने देशवासियों को ‘करो या मरो’ का प्रसिद्ध मंत्र दिया। इसका उद्देश्य भारत से ब्रिटिश शासन को तत्काल समाप्त कर देश को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाना था। उन्होंने कहा कि आंदोलन की घोषणा के बाद 9 अगस्त की सुबह तक ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी समेत कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन इसके बावजूद देश की जनता पीछे नहीं हटी। आंदोलन जल्द ही एक व्यापक जनआंदोलन में बदल गया।
उन्होंने कहा, “करो या मरो केवल एक नारा नहीं था, बल्कि भारत की आजादी का संकल्प था। इसी संकल्प ने देशवासियों में ऐसा साहस और ऊर्जा पैदा की, जिसने स्वतंत्रता के निर्णायक संघर्ष को नई दिशा दी।”
रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के चेयरपर्सन डॉ. सुशील कुमार सिंह ने कहा कि अगस्त क्रांति के प्रणेता महात्मा गांधी विश्व मानवता और अहिंसा के पुजारी थे। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को महात्मा गांधी के विचारों और स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष को समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज देश को मिली आजादी और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए हजारों लोगों ने ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
रिसोर्स पर्सन एवं शिक्षाविद डॉ. अनंतमणि त्रिपाठी ने कहा कि महात्मा गांधी के आह्वान पर भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में शुरू हुआ निर्णायक संघर्ष अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनभावना को एकजुट करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ। उन्होंने कहा कि इसी संघर्ष की परिणति 1947 में देश की स्वतंत्रता के रूप में हुई, जिसे हम हर वर्ष 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं।
डीएवी कॉलेज देहरादून के पूर्व प्राचार्य डॉ. दिनेश सक्सेना ने युवाओं का आह्वान किया कि वे अपनी मूल जड़ों और देश के इतिहास से जुड़े रहें। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान को याद रखना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। युवाओं को देश के लिए संघर्ष करने वाले महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
गोष्ठी में सुनील तिवारी, साधना सिंह, मीना देवी, कृष्णा राजभर, रमन तिवारी, प्रभात द्विवेदी, रोहन कुमार, हर्ष कुमार, वीरेंद्र सिंह, उषा देवी सहित अन्य लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगीत के सामूहिक गायन के साथ हुआ।



