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वनाग्नि रोकने में नाकाम सरकार, अब पुरस्कारों का सहारा

FRI और IGNFA होने के बावजूद 12 साल से धधक रहे उत्तराखंड के जंगल, सरकार अब भी बेबस

जंगलों की आग पर राजनीति नहीं, वैज्ञानिक समाधान चाहिए: हरिसिमरन सिंह

देहरादून। उत्तराखंड में लगातार बढ़ रही वनाग्नि की घटनाओं को लेकर देहरादून साइक्लिंग क्लब ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला है। क्लब के अध्यक्ष हरिसिमरन सिंह ने कहा कि पिछले 12 वर्षों से उत्तराखंड के जंगल हर गर्मियों में आग की चपेट में आ रहे हैं, लेकिन सरकार अब तक कोई स्थायी, वैज्ञानिक और प्रभावी व्यवस्था खड़ी नहीं कर पाई है। उन्होंने कहा कि अब “जंगल की आग बुझाने वालों को पुरस्कार” देने की घोषणाएं यह साबित करती हैं कि सरकार के पास वनाग्नि रोकने के लिए कोई ठोस रोडमैप नहीं है।

हरिसिमरन सिंह ने कहा कि हर साल हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग में जलकर राख हो रहे हैं। इससे दुर्लभ वनस्पतियां खत्म हो रही हैं, वन्यजीवों का जीवन संकट में पड़ रहा है, जल स्रोत सूख रहे हैं और हिमालयी पर्यावरण संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है। इसके बावजूद सरकार की भूमिका केवल घटनाओं के बाद खानापूर्ति तक सीमित दिखाई देती है।

उन्होंने कहा कि सबसे हैरानी की बात यह है कि देश के सबसे प्रतिष्ठित वन एवं पर्यावरण संस्थान Forest Research Institute (FRI), Indira Gandhi National Forest Academy (IGNFA) और राज्य वन विभाग का मुख्यालय खुद देहरादून में मौजूद हैं, लेकिन सरकार इन संस्थानों के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की सलाह को गंभीरता से नहीं ले रही। यदि विशेषज्ञों की मदद ली जाती तो आज उत्तराखंड हर साल वनाग्नि की त्रासदी नहीं झेल रहा होता।

देहरादून साइक्लिंग क्लब ने मांग की कि राज्य में तत्काल एक उच्च स्तरीय “Forest Fire Expert Committee” गठित की जाए, जिसमें वैज्ञानिक, पर्यावरणविद, तकनीकी विशेषज्ञ, आपदा प्रबंधन अधिकारी और स्थानीय ग्रामीणों को शामिल किया जाए। क्लब ने कहा कि वनाग्नि रोकने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

क्लब ने सुझाव दिया कि जंगलों में ड्रोन सर्विलांस, सैटेलाइट मॉनिटरिंग और AI आधारित Early Warning System लागू किए जाएं ताकि आग लगने की घटनाओं का शुरुआती स्तर पर ही पता लगाया जा सके। साथ ही ग्रामीण युवाओं को “वन मित्र” बनाकर प्रशिक्षण और रोजगार दिया जाए, ताकि स्थानीय स्तर पर तेजी से आग पर काबू पाया जा सके।

हरिसिमरन सिंह ने कहा कि चीड़ की पिरूल और सूखी पत्तियां हर साल आग को भयावह रूप देती हैं, लेकिन इनके वैज्ञानिक प्रबंधन की दिशा में अब तक कोई व्यापक अभियान नहीं चलाया गया। उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों में वन संरक्षण एवं आग रोकथाम को लेकर जनजागरूकता अभियान शुरू करने की भी मांग की।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री विश्व मंचों पर पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करते हैं, लेकिन हिमालयी राज्यों में हर साल लगने वाली आग जैसे गंभीर मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त चिंता दिखाई नहीं देती। यह केवल उत्तराखंड का मामला नहीं, बल्कि पूरे देश के पर्यावरण, जलवायु और भविष्य से जुड़ा विषय है।

देहरादून साइक्लिंग क्लब ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने अभी भी वैज्ञानिक और जवाबदेह कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के जंगलों, जल स्रोतों और जैव विविधता को अपूरणीय क्षति होगी। क्लब ने कहा कि अब समय केवल घोषणाओं और पुरस्कारों का नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई का है।

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