
देहरादून। विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर इतिहास संकलन समिति द्वारा एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें बाल श्रम उन्मूलन, बच्चों के शिक्षा के अधिकार और समाज की जिम्मेदारी पर विस्तृत चर्चा की गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता समिति के अध्यक्ष एवं विधि प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने की। उन्होंने कहा कि विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य बाल श्रम की बुराई के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना तथा बच्चों को काम की बजाय शिक्षा, सुरक्षा और गरिमापूर्ण जीवन उपलब्ध कराने के लिए ठोस कदम उठाना है।
डॉ. दीक्षित ने कहा कि यह दिवस समाज को संदेश देता है कि बच्चों का स्थान विद्यालय में है, मजदूरी करने के लिए कार्यस्थल पर नहीं। उन्होंने कहा कि भारत में गरीबी, अशिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में समाज को आगे आकर प्रत्येक बच्चे को सीखने, आगे बढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए। उन्होंने बाल श्रम के खिलाफ कानूनों को और अधिक प्रभावी एवं सख्ती से लागू करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
समिति की सचिव मोहिनी उपाध्याय ने कहा कि विश्व बाल श्रम निषेध दिवस की शुरुआत वर्ष 2002 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य बाल श्रम की रोकथाम तथा इसके मूल कारणों—गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी—को समाप्त करने के लिए सरकारों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों को एकजुट करना है।
समाजसेवी मीना देवी ने अपने संबोधन में कहा कि भारत में बाल श्रम को रोकने के लिए विभिन्न कानूनी प्रावधान किए गए हैं। उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 23 और अन्य संबंधित प्रावधानों के तहत बच्चों को शोषण और खतरनाक कार्यों से सुरक्षा प्रदान की गई है। इसके अलावा, वर्ष 1986 में संसद द्वारा पारित बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम तथा वर्ष 1987 की राष्ट्रीय बाल श्रम नीति इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम रहे हैं।
वक्ताओं ने कहा कि बाल श्रम केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक चुनौती भी है। इसे समाप्त करने के लिए सरकार, समाज और परिवारों को मिलकर प्रयास करने होंगे ताकि हर बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मानजनक भविष्य मिल सके। संगोष्ठी में उपस्थित लोगों ने बाल श्रम मुक्त समाज के निर्माण का संकल्प भी लिया।




