“आपने नौकरानी से शादी नहीं की है…”: सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी, पति को भी निभानी होगी जिम्मेदारी
खाना बनाना-कपड़े धोना सिर्फ पत्नी नहीं पति की भी जिम्मेदारी', वैवाहिक विवाद पर किया स्पष्ट

घर का काम न करना ‘क्रूरता’ नहीं, शादी साझेदारी है—पति-पत्नी दोनों की बराबर भूमिका: सुप्रीम कोर्ट
“खाना नहीं बनाती… घर का काम ठीक से नहीं करती…”—अक्सर शादीशुदा जिंदगी के झगड़ों में ये आरोप सबसे पहले सामने आते हैं। लेकिन क्या सच में ये बातें तलाक का आधार बन सकती हैं? क्या पत्नी का हर हाल में घर संभालना ही उसकी जिम्मेदारी है?
एक ऐसे ही मामले में, जहां पति ने पत्नी पर घरेलू काम न करने का आरोप लगाकर तलाक मांगा, बहस अदालत से निकलकर सीधे समाज की सोच पर जा पहुंची। सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का था, जो आज भी शादी को जिम्मेदारियों का असमान बंटवारा मानती है।
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ऐसी टिप्पणी की, जिसने इस सोच को सीधी चुनौती दे दी।
🔹 “आप नौकरानी से नहीं, जीवनसाथी से शादी कर रहे हैं”
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने पति से साफ कहा,
“आप किसी नौकरानी से शादी नहीं कर रहे हैं, आप एक जीवनसाथी से शादी कर रहे हैं।”
वहीं न्यायमूर्ति न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने जोड़ा,
“समय बदल चुका है… अब पति को भी खाना बनाने, कपड़े धोने और घर के कामों में हाथ बंटाना होगा।”
🔹 कोर्ट ने क्या कहा?
Supreme Court of India ने स्पष्ट किया कि पत्नी द्वारा घर का काम न करना या खाना न बनाना ‘मानसिक क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं आता।
अदालत ने कहा कि शादी कोई एकतरफा जिम्मेदारी नहीं, बल्कि साझेदारी है—जहां दोनों को बराबर सहयोग करना होता है।
अगली सुनवाई में दोनों को उपस्थित होने के आदेश
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने अपनी मौखिक टिप्पणी में कहा कि आप (पति) किसी नौकरानी से शादी नहीं कर रहे है, बल्कि एक जीवनसाथी से शादी कर रहे है। अदालत द्वारा अगली तारीख पर दोनों पक्षों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए कहा गया है।इससे पहले, अदालत ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता (मेडिएशन) के लिए भेजा था, लेकिन वह सफल नहीं हो सका
यह है पूरा मामला?
मामला 2017 में शादीशुदा एक दंपति से जुड़ा है, जिनका एक आठ साल का बेटा भी है। पति ने आरोप लगाया कि शादी के कुछ समय बाद ही पत्नी का व्यवहार बदल गया। वह घर के काम नहीं करती, खाना नहीं बनाती और परिवार के साथ दुर्व्यवहार करती है।
इन्हीं आरोपों के आधार पर उसने ‘क्रूरता’ का हवाला देते हुए तलाक की अर्जी दी।
पत्नी ने लगाया दहेज मांगने का आरोप
दूसरी ओर, पत्नी ने कहा कि वह बच्चे के जन्म के लिए पति और उसके परिवार की सहमति से अपने मायके गई थी, लेकिन वे लोग झूला समारोह में शामिल नहीं हुए और उसके माता-पिता से नकद और सोने की मांग की। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसे अपनी सैलरी देने के लिए मजबूर किया गया।
फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका स्वीकार करते हुए क्रूरता के आधार पर तलाक का डिक्री दे दिया था। इसके खिलाफ पत्नी ने हाई कोर्ट में अपील की, जिसने तलाक के आदेश को रद्द कर दिया। इस फैसले से असंतुष्ट होकर पति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला दिया, लेकिन हाई कोर्ट ने उसे पलट दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
बदलती सोच पर अदालत का बड़ा संदेश
अदालत ने साफ कहा कि पहले की सोच, जिसमें पत्नी को सिर्फ घर संभालने वाली माना जाता था, अब सही नहीं है। घरेलू कामों को लेकर मतभेद को ‘क्रूरता’ कहना गलत है।
कोर्ट ने दोनों पक्षों को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा है, ताकि मामले को समझकर समाधान निकाला जा सके।
यह टिप्पणी सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि समाज के लिए आईना है—जहां शादी अब जिम्मेदारियों का बोझ नहीं, बल्कि बराबरी और सहयोग का रिश्ता बनती जा रही है।




