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उत्तराखंड में 63 हजार हेक्टेयर से ज्यादा भूमि बंजर

सरकारी कवायद न काफी, मंत्री मौन, सुनेगा कौन

संकट की तस्वीर, तेजी से घटती खेती

देहरादून: उत्तराखंड में कृषि क्षेत्र लगातार संकट में है। राज्य पलायन आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 63,291 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि बंजर हो चुकी है। रिपोर्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंपी गई है, जिसमें खेती के सिकुड़ते दायरे और पलायन के बीच गहरा संबंध बताया गया है।

सबसे ज्यादा प्रभावित जिले

रिपोर्ट के अनुसार पर्वतीय जिलों में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर है।

पौड़ी गढ़वाल – 19,744 हेक्टेयर बंजर

अल्मोड़ा – 15,887 हेक्टेयर बंजर

टिहरी गढ़वाल – 8,654 हेक्टेयर बंजर

इन तीन जिलों में ही लगभग 70% बंजर भूमि केंद्रित है। इसके अलावा बागेश्वर, चंपावत, पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी में भी खेती का दायरा घट रहा है।

तराई बनाम पहाड़ : असमान स्थिति

जहां पहाड़ी जिलों में खेती संकट में है, वहीं ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार जैसे तराई क्षेत्रों में कृषि अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है। यहां सिंचाई और बाजार की सुविधा होने से किसान अभी भी खेती से जुड़े हुए हैं।

खेती छोड़ने के प्रमुख कारण

रिपोर्ट में कई अहम वजहें सामने आई हैं जिनमें जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नुकसान  सिंचाई सुविधाओं की कमी, छोटे और बिखरे खेत, बाजार तक सीमित पहुंच, युवाओं का पलायन शामिल हैं।

इन कारणों से खेती अब लाभकारी नहीं रह गई है और ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमशक्ति की कमी बढ़ रही है।

जोखिम वाले जिले

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, टिहरी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा और चंपावत अत्यधिक जोखिम श्रेणी में हैं, जबकि चमोली और पौड़ी उच्च जोखिम में शामिल हैं।

समाधान की राह

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सिंचाई सुविधाओं का विस्तार किया जाए, फसल सुरक्षा के उपाय मजबूत किए जाएं, आधुनिक तकनीक अपनाई जाए, किसानों को बाजार से जोड़ा जाए, स्थानीय रोजगार बढ़ाकर पलायन रोका जाए ताकि लोग कृषि की तरफ आकर्षित हो।

सिर्फ कृषि नहीं, सामाजिक संकट

उत्तराखंड में खेती से बढ़ता मोहभंग केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक असंतुलन का भी संकेत है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट आने वाले समय में और गहरा सकता है।

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