आरटीआई के 21 साल: कितना बदला सरकारी कामकाज, अब भी क्या हैं चुनौतियां?
माया देवी यूनिवर्सिटी में आरटीआई के 21 साल पर मंथन

माया देवी यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लॉ में व्याख्यान, अधिकारों की मजबूती से दुरुपयोग पर अंकुश तक हर पहलू पर चर्चा
प्रतियोगिता में बेहतर प्रदर्शन करने वाली छात्राओं को किया सम्मानित
देहरादून। सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून न आम नागरिकों को सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की ताकत दी है। हालांकि, 21 साल बाद भी इस कानून के इस्तेमाल में कई चुनौतियां बनी हुई हैं। इन्हीं पहलुओं पर माया देवी यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लॉ एंड लीगल स्टडीज में आयोजित व्याख्यान में चर्चा की गई।
विधि विभाग के डीन डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने कहा कि 12 अक्टूबर 2005 को लागू हुए आरटीआई अधिनियम ने नागरिकों को सरकारी कामकाज, सार्वजनिक नीतियों और प्रशासनिक फैसलों से जुड़ी जानकारी हासिल करने का कानूनी अधिकार दिया। इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूती मिली है।
सहायक प्रोफेसर कुमार मयंक ने आरटीआई को आम नागरिकों के लिए सरकारी व्यवस्था से सवाल पूछने का प्रभावी माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि इस अधिकार के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने की जरूरत है। वहीं, सहायक प्रोफेसर रविशा कुर्तीयाल ने ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि वे आरटीआई के माध्यम से गरीबों, वंचितों और जरूरतमंदों को उनके अधिकार दिलाने में अहम योगदान दे रहे हैं।
इस अवसर पर उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग की ओर से आयोजित राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने वाली छात्राओं दीक्षा और गुंजन सिंह को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में डॉ. प्रमोद कुमार, वंदना अरोरा, रविशा कुर्तीयाल और कुमार मयंक सहित अन्य विधि विशेषज्ञ मौजूद रहे।




