
‘मेकिंग मोलहिल्स ऑफ माउंटेन्स’ के तीसरे संस्करण का विमोचन, आपदा प्रबंधन, पर्यटन, पलायन और पर्यावरणीय चुनौतियों पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
देहरादून। उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, सामुदायिक भागीदारी और संवैधानिक अधिकारों के बीच संबंधों को केंद्र में रखते हुए ‘मेकिंग मोलहिल्स ऑफ माउंटेन्स’ के तीसरे संस्करण का शनिवार को दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में विमोचन किया गया। एसडीसी फाउंडेशन और बिशेन सिंह महेंद्र पाल सिंह की ओर से प्रकाशित इस संस्करण की थीम ‘कम्युनिटीज एंड कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स इन द टाइम्स ऑफ क्लाइमेट क्राइसिस’ रखी गई है।
पुस्तक में वर्ष 2025 के दौरान उत्तराखंड में सामने आई प्रमुख जलवायु आपदाओं का अध्ययन किया गया है। उत्तराखंड डिजास्टर एंड एक्सीडेंट एनालिसिस इनिशिएटिव के तहत जनवरी से दिसंबर तक तैयार 12 मासिक रिपोर्टों में दर्ज 98 प्रमुख क्लाइमेट डिजास्टर्स की समाचार रिपोर्टों का विश्लेषण इसमें शामिल है।
विश्लेषण के आधार पर उत्तराखंड के लिए पांच प्रमुख रेड फ्लैग सामने रखे गए हैं। इनमें आपदा रोकथाम में प्रशासनिक देरी और जवाबदेही की कमी, शहरी एवं अर्ध-शहरी इलाकों में बढ़ता आपदा जोखिम, ग्लेशियल झीलों और क्रायोस्फियर में बदलाव, बुनियादी ढांचे से जुड़े आपदा जोखिम और आवाजाही का संकट तथा नाजुक हिमालयी पर्यावरण पर बढ़ते पर्यटन का दबाव शामिल हैं।
इन विषयों पर पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी, अर्बन थिंकर जगन शाह, वाडिया इंस्टीट्यूट के डॉ. मनीष मेहता, डॉ. लोकेश ओहरी और एक्वाटेरा एडवेंचर्स के वैभव काला समेत विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे हैं।
पुस्तक में जलवायु संकट के साथ संविधान और कानून के पहलू को भी प्रमुखता दी गई है। यूपीईएस यूनिवर्सिटी के आदित्य रावत ने उत्तराखंड में पर्यावरणीय कानूनों और विधानों के पिछले 25 वर्षों के परिदृश्य का अध्ययन किया है। वहीं गौतम कुमार ने परिसीमन और राज्य से जारी पलायन की समस्या के संबंधों पर विचार रखा है। प्रेरणा रतूड़ी ने पहाड़ी क्षेत्र में स्थानीय निवासी के अनुभवों को भी पुस्तक का हिस्सा बनाया है।
पुस्तक की भूमिका लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के पूर्व निदेशक डॉ. संजीव चोपड़ा ने लिखी है। कार्यक्रम में संपादक प्रेरणा रतूड़ी ने पुस्तक का परिचय दिया। अनूप नौटियाल ने कहा कि उत्तराखंड के विकास संबंधी विमर्श में जलवायु परिवर्तन, समुदायों और संवैधानिक चिंताओं को मुख्यधारा में लाने की जरूरत है।
डॉ. मनीष मेहता, डॉ. लोकेश ओहरी और गौतम कुमार ने अपने लेखों में उठाए गए प्रमुख मुद्दों पर विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन एसडीसी फाउंडेशन के दिनेश सेमवाल ने किया, जबकि अभिमन्यु गहलोत ने आभार व्यक्त किया।
लोकार्पण में विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं और फैकल्टी के साथ ही सिविल सोसायटी, शोध क्षेत्र और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग मौजूद रहे। आयोजकों ने कहा कि उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन, समुदायों और संवैधानिक अधिकारों के संबंधों पर व्यापक संवाद की आवश्यकता है। साथ ही विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, सिविल सोसायटी और युवाओं से राज्य के लिए अधिक टिकाऊ और जवाबदेह विकास मॉडल पर विमर्श आगे बढ़ाने का आह्वान किया गया।




