
यदि सपने में बार-बार सांप दिखाई दें, अनजाना भय बना रहे या जीवन में लगातार बाधाएं आ रही हों और समाधान न मिल रहा हो, तो ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में कालसर्प दोष की संभावना मानी जाती है। कालसर्प दोष राहु–केतु के विशेष संयोग से बनता है और इसके कई प्रकार होते हैं। कुंडली में राहु–केतु की स्थिति से दोष का प्रकार पहचाना जाता है।
क्या होता है कालसर्प दोष?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जन्मकुंडली में जब सभी ग्रह राहु और केतु के बीच आ जाते हैं, तो उसे कालसर्प दोष कहा जाता है। यहाँ ‘काल’ राहु का बोध कराता है और ‘सर्प’ केतु से संबंधित है। राहु को सर्प का मुख तथा केतु को पूंछ माना जाता है। इस स्थिति में राहु–केतु अन्य ग्रहों के शुभ प्रभावों को बाधित कर सकते हैं।
कालसर्प दोष के प्रकार
अनंत कालसर्प दोष
राहु लग्न में हो और केतु सप्तम भाव में स्थित हो तथा सभी अन्य ग्रह सप्तम से द्वादश, एकादशी, दशम, नवम, अष्टम और सप्तम में स्थित हो तो यह अनंत कालसर्प योग कहलाता है।
कुलिक कालसर्प दोष
राहु द्वितीय भाव में तथा केतु अष्टम भाव में हो और सभी ग्रह इन दोनों ग्रहों के बीच में हो तो कुलिक नाम कालसर्प योग होगा।
वासुकी कालसर्प दोष
राहु तृतीय भाव में स्थित है तथा केतु नवम भाव में स्थित होकर जिस योग का निर्माण करते हैं तो वह दोष वासुकी कालसर्प दोष कहलाता है।
शंखपाल कालसर्प दोष
राहु चतुर्थ भाव में तथा केतु दशम भाव में स्थित होकर अन्य ग्रहों के साथ जो निर्माण करते हैं तो वह कालसर्प दोष शंखपाल के नाम से जाना जाता है।
पद्य कालसर्प दोष
चतुर्थ स्थान पर दिए दोष के ऊपर का है पद्य कालसर्प दोष इसमें राहु पंचम भाव में तथा केतु एकादश भाव में साथ में एकादशी पंचांग 8 भाव में स्थित हो तथा इस बीच सारे ग्रह हों तो पद्म कालसर्प योग बनता है।
महापद्म कालसर्प दोष
राहु छठे भाव में और केतु बारहवे भाव में और इसके बीच सारे ग्रह अवस्थित हों तो महापद्म कालसर्प योग बनता है।
तक्षक कालसर्प दोष
जन्मपत्रिका के अनुसार राहु सप्तम भाव में तथा केतु लग्न में स्थित हो तो ऐसा कालसर्प दोष तक्षक कालसर्प दोष के नाम से जाना जाता है।
कर्कोटक कालसर्प दोष
केतु दूसरे स्थान में और राहु अष्टम स्थान में कर्कोटक नाम कालसर्प योग बनता है।
शंखचूड़ कालसर्प दोष
सर्प दोष जन्मपत्रिका में केतु तीसरे स्थान में व राहु नवम स्थान में हो तो शंखचूड़ नामक कालसर्प योग बनता है।
घातक कालसर्प दोष
कुंडली में दशम भाव में स्थित राहु और चतुर्थ भाव में स्थित केतु जब कालसर्प योग का र्निमाण करता है तो ऐसा कालसर्प दोष घातक कालसर्प दोष कहलाता है।
विषधर कालसर्प दोष
केतु पंचम और राहु ग्यारहवे भाव में हो तो विषधर कालसर्प योग बनाते हैं।
शेषनाग कालसर्प दोष
कुंडली में राहु द्वादश स्थान में तथा केतु छठे स्थान में हो तथा शेष 7 ग्रह नक्षत्र चतुर्थ तृतीय और प्रथम स्थान में हो तो शेषनाग कालसर्प दोष का निर्माण होता है।
कालसर्प दोष के लक्षण
- जिस व्यक्ति की कुंडली में काल सर्प दोष होते हैं इस व्यक्ति को अक्सर सपने में मृत लोग दिखाई देते हैं। इतना ही नहीं कुछ लोगों को तो यह भी दिखाई देता है कि कोई उनका गला दबा रहा हो।
- जिस व्यक्ति के जीवन में काल सर्प दोष होता है उसे जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है और जब उसको जरुरत होती है तब उसे अकेलापन महसूस होता है।
- कालसर्प से पीड़ित व्यक्ति के कारोबार पर काफी नकारात्मक असर पड़ता है। इसे व्यापार में बार बार हानी का सामना करना पड़ता है।
- इसके अलावा नींद में शरीर पर सांप को रेंगते देखना, सांप को खुद को डसते देखना।
- बात-बात पर जीवनसाथी से वाद विवाद होना। यदि रात में बार बार आपकी नींद खुलती है तो यह भी काल सर्प दोष का ही लक्षण है।
- इसके अलावा काल सर्प दोष से पीड़ित व्यक्ति को सपने में बार-बार लड़ाई झगड़ा दिखाई देता है।
कितनी अवधि तक रहता है कालसर्प दोष
काल सर्प दोष के कारण व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान होता है। साथ ही सिर दर्द, त्वचारोग आदि भी कालसर्प दोष के लक्षण है।कालसर्प दोष की अवधि कुंडली में राहु की स्थिति पर निर्भर करती है, जो 27 से 42 साल या उससे अधिक (मृत्यु तक) हो सकती है, लेकिन इसका प्रभाव 33 वर्ष की आयु के आसपास एक महत्वपूर्ण मोड़ लेता है, जिसके बाद या तो मुश्किलें बढ़ती हैं या अप्रत्याशित सफलता मिलती है, और यह व्यक्ति के कर्मों व निवारण पर भी निर्भर करता है।
राहु की स्थिति के अनुसार अवधि
- राहु पहले भाव में: लगभग 27 साल तक।
- राहु दूसरे भाव में: लगभग 33 साल तक।
- राहु चौथे भाव में: लगभग 42 साल तक।अन्य महत्वपूर्ण बातें:
- 33 वर्ष की आयु: यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहां दोष का प्रभाव कम या ज्यादा हो सकता है; यदि 33 तक कष्ट है तो बाद में राहत मिल सकती है, और यदि पहले सफलता मिली तो आगे रुकावटें आ सकती हैं।
- आजीवन प्रभाव: कुछ मान्यताओं के अनुसार, यह दोष पूरी जिन्दगी रह सकता है, लेकिन राहु-केतु की दशा-अंतरदशा में इसका प्रभाव अधिक होता है।
- निवारण: उचित पूजा, दान और अच्छे कर्मों से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
शिव करते हैं काल सर्प का शमन
भगवान शंकर जिन्होंने जगत के कल्याण के लिए कालकूट विष को अपने गले में धारण कर लिया उनके अतिरिक्त कालसर्प आदि ग्रह दोषों का शमन करने में और कौन समर्थ है। इसलिए जिस किसी को भी इस योग से कष्ट मिल रहा हो वह महाकाल रूद्र की आराधना करे। ऐसा करने से कालसर्प दोष से स्वत: ही मुक्ति मिल जाती है।



