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155 साल का हुआ देहरादून, इतिहास और विकास पर मंथन

देहरादून स्थापना दिवस पर गोष्ठी, विशेषज्ञों ने बताया शहर के विकास का इतिहास

1871 में रखी गई थी देहरादून के विकास की नींव, आज बना देश का एजुकेशन हब

देहरादून। देहरादून की स्थापना के 155 वर्ष पूरे होने के अवसर पर रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के तत्वावधान में शनिवार को एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शहर के इतिहास, प्रशासनिक विकास और शिक्षा के क्षेत्र में उसकी उपलब्धियों पर विस्तार से चर्चा की गई।

मुख्य वक्ता प्रोफेसर अनिल दीक्षित ने कहा कि 11 जुलाई 1871 को देहरादून एक्ट-1871 के तहत देहरादून को विधिवत एक स्वतंत्र प्रशासनिक जिले का दर्जा मिला था। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी हुकूमत ने उसी समय देहरादून के सुनहरे भविष्य की आधारशिला रख दी थी। आज 155 वर्षों का सफर तय कर चुका देहरादून उत्तराखंड की राजधानी होने के साथ-साथ देश के प्रमुख एजुकेशनल हब के रूप में अपनी पहचान बना चुका है।

रिसर्च फाउंडेशन के चेयरमैन डॉ. सुशील कुमार ने बताया कि ब्रिटिश शासन के दौरान 11 जुलाई 1871 को देहरादून को सहारनपुर जिले से अलग कर स्वतंत्र जिला बनाया गया था। प्रारंभ में यह मेरठ मंडल के अधीन रहा और बाद में वर्ष 1968 में इसे कुमाऊं मंडल से हटाकर नवगठित गढ़वाल मंडल में शामिल किया गया।

मुख्य अतिथि एवं पंतनगर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर अजित कुमार कर्नाटक ने देहरादून के ऐतिहासिक विकास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्ष 1676 में सिख गुरु राम राय जी ने दून घाटी में अपना डेरा स्थापित किया था। इसी ‘डेरा दून’ से आगे चलकर देहरादून नाम प्रचलित हुआ। उन्होंने कहा कि 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद देहरादून को राज्य की अस्थायी राजधानी बनाया गया और आज यह भारत के प्रमुख शैक्षणिक एवं अनुसंधान केंद्रों में गिना जाता है।

गोष्ठी में डॉ. संदीप सक्सेना, श्रीमती मीना तिवारी, मनोज त्रिपाठी, किशन अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल, इरम ज़ेबा सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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