
क्रूड ऑयल कभी सस्ता तो कभी महंगा हुआ, लेकिन आम आदमी को नहीं मिली राहत
वर्ष 2010 से 2026 तक भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जहां वर्ष 2010 में पेट्रोल करीब 50 रुपये प्रति लीटर और डीजल 38 रुपये प्रति लीटर के आसपास मिलता था, वहीं वर्ष 2026 में पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर के पार और डीजल 90 रुपये प्रति लीटर के करीब पहुंच चुका है। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में भी बड़े उतार-चढ़ाव देखने को मिले, लेकिन उसका लाभ आम उपभोक्ताओं को बहुत कम मिला।

आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010 में वैश्विक बाजार में क्रूड ऑयल की औसत कीमत करीब 79 डॉलर प्रति बैरल थी। इसके बाद 2011 से 2013 के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जिससे भारत में भी पेट्रोल-डीजल महंगे हुए। वर्ष 2014 में नई सरकार बनने के बाद कुछ समय तक वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई और 2015-16 में क्रूड ऑयल घटकर करीब 43 से 46 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। इसके बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल के दामों में अपेक्षित राहत नहीं मिली।
विशेषज्ञों के अनुसार इसका प्रमुख कारण केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले एक्साइज ड्यूटी और वैट रहे। 2017 के बाद दैनिक मूल्य निर्धारण प्रणाली लागू होने से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में रोज बदलाव शुरू हुआ। वर्ष 2018 में एक बार फिर पेट्रोल 80 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गया।
कोविड-19 महामारी के दौरान वर्ष 2020 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें ऐतिहासिक रूप से नीचे चली गईं, लेकिन भारत में टैक्स बढ़ने के कारण पेट्रोल-डीजल अपेक्षाकृत महंगे ही बने रहे। इसके बाद 2021 और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते वैश्विक ऊर्जा संकट गहराया और कई राज्यों में पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर से ऊपर पहुंच गया।
अब वर्ष 2026 में तेल कंपनियों द्वारा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 3 रुपये प्रति लीटर की नई वृद्धि किए जाने के बाद आम जनता पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ गया है। जानकारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार, टैक्स ढांचा और डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति भविष्य में भी ईंधन कीमतों को प्रभावित करती रहेगी।




