खतरे में विश्व की धरोहरें, संरक्षण के लिए जागरूकता जरूरी : डॉ. अनिल दीक्षित

विश्व धरोहर दिवस पर चेतावनी: संघर्ष और आपदाएं बना रहीं बड़ा खतरा
देहरादून। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर वर्ष 18 अप्रैल को मनाए जाने वाले विश्व स्मारक एवं धरोहर दिवस के अवसर पर इतिहास संकलन समिति के तत्वावधान में एक जागरूकता गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाना रहा।
गोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में उत्तरांचल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. अनिल दीक्षित ने कहा कि वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते राजनीतिक संघर्ष और क्षेत्रीय स्तर पर फैल रही द्वेष एवं घृणा की भावना हमारी धरोहरों के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि विश्वभर में कई ऐतिहासिक धरोहरें नष्ट हो चुकी हैं, जो मानव सभ्यता के लिए एक बड़ी क्षति है।
डॉ. दीक्षित ने बताया कि विश्व विरासत दिवस की शुरुआत वर्ष 1982 में International Council on Monuments and Sites द्वारा की गई थी, जिसे 1983 में UNESCO ने आधिकारिक मान्यता प्रदान की। इसके बाद से यह दिवस विश्वभर में धरोहर संरक्षण के संदेश के साथ मनाया जाता है।
उन्होंने भारतीय परिप्रेक्ष्य में बताया कि देश की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के लिए संसद द्वारा कई महत्वपूर्ण कानून बनाए गए हैं, जिनमें प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 तथा पुरातन वस्तुएं एवं कला धरोहर अधिनियम, 1972 प्रमुख हैं। साथ ही संविधान के अनुच्छेद 49 और 51A(f) नागरिकों और राज्य दोनों को धरोहरों के संरक्षण का दायित्व सौंपते हैं।
इस वर्ष UNESCO द्वारा “विरासत स्थलों पर आपदा और संघर्ष का संकट” थीम निर्धारित की गई है, जिस पर विशेष रूप से चर्चा की गई।
कार्यक्रम में समिति की अध्यक्ष श्रीमती मीना तिवारी ने मसूरी में वीरान पड़ी रानी झांसी लक्ष्मीबाई के वकील John Lang की कब्र को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक स्थल का संरक्षण बेहद आवश्यक है।
गोष्ठी में सुनील तिवारी, सुधीर अग्रवाल, कनिष्क उपाध्याय, मोहिनी दीक्षित, पुष्पेंद्र यादव सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। वक्ताओं ने धरोहर संरक्षण को जन आंदोलन बनाने और युवाओं को इससे जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।



