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आंकड़ों की बाजीगरी में उलझा बजट 2026-27

राजस्व का बड़ा हिस्सा वेतन-पेंशन और ब्याज भुगतान में

बजट 2026-27 : राजस्व सरप्लस के दावे के बीच बढ़ता कर्ज और अनिवार्य खर्च चुनौती

लोक ऋण जीएसडीपी के 32.5% तक,  बजट के आंकड़ों पर उठे सवाल

देहरादून
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा विधानसभा में पेश किए गए वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में सरकार ने विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाने का दावा किया है। बजट में 2536.33 करोड़ रुपये का राजस्व अधिशेष (Revenue Surplus) दिखाया गया है, लेकिन वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि राज्य की आय और व्यय की संरचना अभी भी कई चुनौतियों की ओर इशारा कर रही है।
बजट के अनुसार राज्य सरकार को मिलने वाले कुल राजस्व में सबसे बड़ा हिस्सा स्वयं के कर राजस्व (28.85 प्रतिशत) का है। इसके बाद केन्द्रीय करों में राज्यांश 19.39 प्रतिशत और केन्द्रीय सरकार से सहायता व अनुदान 20.59 प्रतिशत है। वहीं करेत्तर राजस्व 6.35 प्रतिशत, लोक लेखा शुद्ध 0.75 प्रतिशत, ऋण एवं अग्रिम की वसूली 0.03 प्रतिशत तथा लोक ऋण 24.04 प्रतिशत हिस्सा राजस्व संरचना में शामिल है। इससे स्पष्ट है कि राज्य को अपने विकास कार्यों के लिए अब भी कर्ज पर काफी हद तक निर्भर रहना पड़ रहा है।
खर्च के आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य सरकार के बजट का बड़ा हिस्सा अनिवार्य मदों में खर्च हो रहा है। वेतन, भत्ते और मजदूरी जैसे अधिष्ठान व्यय पर 25.45 प्रतिशत, पेंशन व अनुतोषित भुगतान पर 12.45 प्रतिशत तथा ब्याज भुगतान पर 8.87 प्रतिशत खर्च हो रहा है। यानी केवल इन तीन मदों में ही सरकार को अपने कुल व्यय का लगभग आधा हिस्सा खर्च करना पड़ रहा है।
इसके अलावा निवेश ऋण पर 9.08 प्रतिशत, अनुदान, अंशदान और राज्य सहायता पर 4.72 प्रतिशत, जबकि वृहत एवं लघु निर्माण कार्यों पर 12.49 प्रतिशत खर्च का प्रावधान किया गया है। वहीं अन्य व्ययों का हिस्सा 26.95 प्रतिशत है।
राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम के अनुसार राज्य का राजकोषीय घाटा जीएसडीपी के 3 प्रतिशत के भीतर होना चाहिए, लेकिन मौजूदा बजट में यह आंकड़ा 3.5 प्रतिशत से अधिक बताया जा रहा है। इसी प्रकार राज्य का लोक ऋण जीएसडीपी के 32.50 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जबकि एफआरबीएम अधिनियम में इसे 30 प्रतिशत तक सीमित रखने का प्रावधान है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बजट में विकास कार्यों को गति देने के लिए संसाधन जुटाने की कोशिश तो की गई है, लेकिन बढ़ते कर्ज और वेतन-पेंशन जैसे अनिवार्य खर्चों के दबाव के कारण वित्तीय संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बना रहेगा। बजट में राजस्व सरप्लस का दावा जरूर किया गया है, लेकिन कई खर्चों के मदों में बदलाव को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

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