
जगमोहन मेंहदीरत्ता (विशेष टिप्पणी)
महँगाई, रोज़गार और सार्वजनिक सेवाओं के मोर्चे पर आम आदमी की चिंताओं को दरकिनार करता ताज़ा केंद्रीय बजट एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण
देहरादून।
हर साल केंद्रीय बजट को आम आदमी की आकांक्षाओं का दस्तावेज़ बताकर प्रस्तुत किया जाता है। “समावेशी विकास”, “अंतिम छोर तक पहुँच” और “सशक्तिकरण” जैसे आकर्षक शब्दों के साथ सरकार अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को रेखांकित करती है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि आम नागरिक अक्सर बजट के बारीक अक्षरों में खुद को तलाशता रह जाता है।
ताज़ा बजट भी इससे अलग नहीं दिखता। यह बाज़ारों को स्थिरता, निवेशकों को भरोसा और कॉरपोरेट क्षेत्र को निरंतरता का संदेश देता है, लेकिन उन करोड़ों लोगों के लिए ठोस राहत का रास्ता साफ़ नहीं करता, जिनका जीवन महँगाई, रोज़गार की असुरक्षा और सिमटती सार्वजनिक सेवाओं से प्रभावित है।
महँगाई: रोज़मर्रा की चुनौती
आम आदमी के लिए अर्थव्यवस्था जीडीपी के आँकड़ों या राजकोषीय घाटे से नहीं, बल्कि रसोई के खर्च, ईंधन की कीमतों, किराए, परिवहन, स्वास्थ्य और शिक्षा की लागत से तय होती है। खाद्य पदार्थों की महँगाई और ईंधन पर ऊँचे कर लगातार दबाव बनाए हुए हैं। इसके बावजूद बजट में मूल्य नियंत्रण, सार्वभौमिक सब्सिडी या सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मज़बूत करने जैसे ठोस उपायों की कमी महसूस की जा रही है।
रोज़गार: सबसे बड़ा सवाल
देश की आर्थिक वृद्धि के दावों के बीच बेरोज़गारी और अर्ध-बेरोज़गारी आम लोगों की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। युवा, प्रवासी मज़दूर और असंगठित क्षेत्र के कामगार एक ही सवाल दोहराते हैं — नौकरियाँ कहाँ हैं?
बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर और कौशल विकास पर ज़ोर तो दिया गया है, लेकिन प्रत्यक्ष रोज़गार सृजन, शहरी रोज़गार गारंटी या सार्वजनिक क्षेत्र में भर्ती जैसे ठोस कदमों का अभाव नज़र आता है।
कर व्यवस्था और असमानता
कर ढाँचे में पूँजी और बड़े निवेशकों को प्राथमिकता देने के आरोप भी उठते रहे हैं। आम आदमी जीएसटी, ईंधन कर और उपयोग शुल्क जैसे अप्रत्यक्ष करों के ज़रिए अपेक्षाकृत ज़्यादा बोझ उठाता है, जबकि संपत्ति कर, उत्तराधिकार कर और व्यापक कॉरपोरेट कर सुधार जैसे विषय अब भी चर्चा से बाहर हैं।
सार्वजनिक सेवाएँ और सामाजिक सुरक्षा
स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन और आवास जैसे क्षेत्रों में सरकारी खर्च को आम आदमी की असली सुरक्षा कवच माना जाता है। आलोचकों का कहना है कि इन क्षेत्रों में आवंटन ज़रूरतों के मुकाबले अपर्याप्त है। नतीजतन, निजी खर्च बढ़ता है और आम परिवारों पर आर्थिक दबाव और गहरा होता जाता है।
विशेषज्ञों और सामाजिक चिंतकों का मानना है कि बजट का मूल्यांकन केवल बाज़ार की प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि रोज़गार, महँगाई, मज़दूरी और सार्वजनिक सेवाओं पर उसके असर से किया जाना चाहिए।
जब तक विकास के साथ-साथ आम आदमी की रोज़मर्रा की समस्याओं को नीति के केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक बजट में वह मौजूद तो रहेगा, लेकिन केवल भाषणों और दस्तावेज़ों तक सीमित।




