
वो उम्र जब बच्चे आसमान में सपने उड़ाते हैं, मिट्टी में हंसते-खिलखिलाते हैं… उसी उम्र में एक बच्ची का संसार एक अंधेरे कमरे में कैद कर दिया गया। वजह कोई अपराध नहीं थी—सिर्फ डर। ऐसा डर, जिसने उसकी रक्षा तो की… लेकिन उसके पूरे बचपन, उसकी पहचान और उसकी दुनिया की कीमत पर।
वह सिर्फ छह साल की थी, जब उसके आसपास का माहौल उसके परिवार के लिए भय का दूसरा नाम बन गया। मां पहले ही दुनिया छोड़ चुकी थीं, पिता अकेले थे… और एक मासूम बच्ची पर एक बिगड़ी हुई निगाह पड़ने के बाद उनके मन में एक ही डर बस गया—
“कहीं मेरी बच्ची किसी हैवान की शिकार न बन जाए…”
डर ने पिता को वह कदम उठाने पर मजबूर किया, जिसके नतीजे बेहद दर्दनाक निकले।
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के बकावंड इलाके में यह दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहां छह साल की उम्र में एक मासूम को परिवार ने डर और असुरक्षा के कारण कमरे में बंद कर दिया। मां नहीं थी, पिता अकेले थे, और गांव के एक बिगड़े युवक की नज़र बच्ची पर पड़ने के बाद परिवार इतना सहम गया कि उसे घर के भीतर ही कैद रखना ही सुरक्षित समझा। यह “सुरक्षा” दिन, महीने और सालों में बदलती गई—और मासूम का पूरा बचपन अंधेरे में खो गया।
बेटी को सुरक्षित रखने के लिए परिवार ने उसे एक कमरे में बंद कर दिया।
दिन पर दिन… साल पर साल… और आंख झपकते-झपकते बीस साल गुजर गए। उसका कमरा ही उसका आसमान बन गया। चार दीवारें ही उसका संसार।
थाली खटकने की आवाज ही बातचीत का माध्यम।
सन्नाटा ही साथी।
और अंधेरा—जिसे उसने कभी दुश्मन समझा ही नहीं, क्योंकि वही उसका हर दिन था।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, कमरे का अंधेरा उसकी आंखों की रोशनी में भी उतरता चला गया।
जब सामाजिक न्याय विभाग की टीम ने उसे आखिरकार बाहर निकाला, तब वह रोशनी देखने की क्षमता लगभग खो चुकी थी।
कई साल बाद उसके कदम जब दहलीज़ से बाहर पड़े—तो दुनिया उसके लिए बिल्कुल नई थी।
पहली बार किसी ने उसे गोद में उठाया, किसी ने उसका हाथ थामकर कहा—
“तुम अकेली नहीं हो।”
उसे ‘घरौंदा आश्रम’ ले जाया गया, जहां अब वह फिर से चलना सीख रही है, लोगों को पहचानना सीख रही है और दुनिया को पहली बार महसूस कर रही है।
बैठना, उठना, बोलना, मुस्कुराना—ये सब जैसे अभी-अभी उसकी जिंदगी ने शुरू किया है।
बीस साल बाद किसी ने उसका नाम पुकारा—
और शायद पहली बार उसने महसूस किया कि उसकी कहानी सिर्फ अंधेरे की नहीं, अब उम्मीद की भी है।




