आसमान से आई राहत: आइआइटी की तकनीक से दिल्ली में कृत्रिम बारिश
सिल्वर आयोडाइड और नमक से बने कृत्रिम बादल

आइआइटी की मदद से शुरू हुआ क्लाउड सीडिंग ऑपरेशन
नई दिल्ली : जहरीले स्मॉग से जूझती दिल्ली ने मंगलवार को आसमान की ओर राहत भरी नजरों से देखा — जब पहली बार बादलों से कृत्रिम बारिश कराने की कोशिश की गई।
यह था देश की राजधानी में शुरू हुआ क्लाउड सीडिंग ऑपरेशन, जिसका उद्देश्य है बारिश की बूंदों से हवा में घुला ज़हर धो देना।
इस अनोखे प्रयोग के पीछे हैं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) के वैज्ञानिक, जो तकनीक से प्रदूषण पर काबू पाने का नया रास्ता खोज रहे हैं।
क्या है क्लाउड सीडिंग?
क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें बादलों में ऐसे कण छोड़े जाते हैं जो वर्षा को प्रेरित करते हैं।
आमतौर पर इसमें सिल्वर आयोडाइड (Silver Iodide) या सोडियम क्लोराइड (नमक) जैसे यौगिकों का प्रयोग होता है। ये सूक्ष्म कण बादलों में बर्फ जैसे क्रिस्टल बनाकर पानी की छोटी बूंदों को जोड़ते हैं, जिससे वे बड़ी होकर वर्षा के रूप में नीचे गिरती हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह तकनीक बादल बनाती नहीं, बल्कि मौजूदा बादलों से बारिश कराने में मदद करती है।
आइआइटी की वैज्ञानिक भूमिका
- आइआइटी कानपुर और अन्य आइआइटी संस्थानों ने भारतीय वायुमंडल के अनुसार इस तकनीक को अनुकूलित किया है।
- विशेष एयरक्राफ्ट पे-लोड्स तैयार किए गए हैं जो रसायनों को सटीकता से बादलों में छोड़ते हैं।
- ऑपरेशन रीयल-टाइम मौसम डेटा से संचालित होता है ताकि उन्हीं बादलों को निशाना बनाया जाए जिनसे वर्षा की संभावना अधिक हो।
- वैज्ञानिक मॉडलिंग और पूर्वानुमान प्रणाली के जरिए इसका प्रभाव और दक्षता माप रहे हैं।
- दिल्ली में पहली बार 1957 में मानसून के समय कृत्रिम बारिश का प्रयोग हुआ था. अब आईआईटी कानपुर ने इसको तैयार किया है.
क्यों जरूरी हुआ यह कदम
हर साल सर्दियों में दिल्ली की हवा सांस लेने लायक नहीं रहती। वाहनों का धुआं, पराली जलाना और ठहरा हुआ मौसम — ये सब मिलकर जहरीली स्मॉग की मोटी परत बना देते हैं।
इस साल हालात इतने बिगड़े कि हवा में PM2.5 और PM10 कणों का स्तर खतरनाक सीमा पार कर गया।
इसी स्थिति में मंगलवार को आइआइटी के सहयोग से क्लाउड सीडिंग ऑपरेशन लॉन्च किया गया। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक, हल्की फुहारों से हवा की गुणवत्ता में सुधार और दृश्यता बढ़ने के संकेत मिले हैं।
क्या यह स्थायी समाधान है?
- विशेषज्ञों का मानना है कि क्लाउड सीडिंग स्थायी उपाय नहीं, लेकिन यह प्रदूषण के चरम स्तर पर आपात राहत तकनीक के रूप में बेहद उपयोगी है।
- आइआइटी के वैज्ञानिक इस तकनीक को और परिष्कृत कर रहे हैं ताकि यह अधिक सटीक, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बन सके।
- अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो भविष्य में इसे मुंबई, लखनऊ, पटना और अन्य प्रदूषण-प्रभावित शहरों में भी लागू किया जा सकता है।
आसमान से आई राहत की उम्मीद
कुल मिलाकर प्रदूषण से त्रस्त दिल्ली के लिए यह पहल सिर्फ एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं, बल्कि राहत की नई किरण है। अगर कृत्रिम बारिश हवा को साफ करने में सफल होती है, तो यह भारत में पर्यावरण प्रबंधन के नए युग की शुरुआत हो सकती है।




