Breaking Newsउत्तराखंडराजनीती

राजनीति में भाषाई मर्यादा 

वशिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव की कलम से

न जाने क्यूं गुसाईं की चौपाई,”जाके पांव न फटी बेवाई, उ का जाने पीर पराई…’

बात देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की मां के विषय में कहे गए गाली व अपशब्दों को लेकर है। वो अपशब्द क्या थे न तो सुन पाया और न ही जान पाया। एआई ने भी मां से संबंधित अपशब्द ही कहे। शब्द का उल्लेख किसी ने नहीं किया। किसी को भी गाली देना गलत है, विकृत मानसिकता का परिचायक है। खासकर महिलाओं के लिए। पर अफसोस की बात है कि रिश्तों में प्रयुक्त कुछ शब्दों (साला-साली) से लेकर ज्यादातर गालियां महिलाओं से ही जुड़ी होती हैं जो हमारे पुरुष प्रधान समाज की देन है। रही गाली (शादी-ब्याह में गायी जाने वाली गाली को छोड़कर) की बात तो गाली वही दे सकता है जिसके मन में घृणा हो, नफरत हो। प्यार में किसी को भी गाली देते शायद ही किसी ने देखा हो। अपवादस्वरूप पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ और इलाहाबाद को छोड़कर। यहां पर जुंबा पर गाली रखी रहती है। शायद यहां वालों के लिए ये शब्द अपना अर्थ खो चुके हैं।

बात मुद्दे की कुछ दिनों पहले एक राजनीतिक मंच पर किसी ने पीएम मोदी को या उनकी मां के विषय में अपशब्दों का प्रयोग किया। क्रिया की प्रतिक्रिया हुई। दूसरे पक्ष ने सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी से माफ़ी की मांग की। जहां इनमें तमाम कैबिनेट मंत्री, मंत्री, पार्टी प्रवक्ता व मुख्यधारा की मीडिया का बड़ा हिस्सा शामिल था वहीं सोशल मीडिया पर भी इसकी प्रतिक्रिया हुई। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि, सभा संयुक्त थी जिसमें आरजेडी, कांग्रेस, वामपंथी दल, और एक क्षेत्रीय पार्टी शामिल हैं। पर माफ़ी, घेरेबंदी, राजनीतिक हमले राहुल गांधी पर ही हुए और उनकी पार्टी के कार्यालय पर तोड़फोड़ भी। बिहार में कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल भी नहीं है। इससे पहले भी राहुल ही निशाना बनाए जाते रहे। उनकी लोकसभा की सदस्यता भी छीनी गई थी। स्मृति ईरानी ने भी उन पर अश्लील हरकत का आरोप लगाया था।

किसी ने कहा है कि ‘तोल मोल के बोल’। और वो भी भीड़ और चुनाव को देखकर तो और भी क्योंकि जोश कुछ ज्यादा बढ़ जाता है और नेता गण भी जोश में होश खो देते हैं। पिछले कुछ सालों में शायद ही ऐसा कोई चुनाव आया हो जिसमें नेताओं के बोल बिगड़े न हों और उन्होंने सामान्य शिष्टाचार भी नहीं निभाया यही नहीं अभद्र शब्दों का भी प्रयोग किया।

अब तो हाल यह हो गया कि शायद ही कोई भी चुनावी सभा हो, रैली हो उन्हें एक दूसरे को कोसना अनिवार्य हो गया है।

अब इसमें जिंदा ही नहीं जो अब इस दुनिया में नहीं है वो भी आ रहे हैं। उन्हें भी पानी पी-पी के गाली दी जाती है। अब देखिए न देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अब तक कोसा जा रहा है। कोसने की हालत यह हो गई है कि उनके चरित्र पर भी हमला किया जा रहा है। नेताओं के बोल, उनकी भाषा कबसे बिगड़ी किसने इसकी शुरुआत की इसका इतिहास तो मिलना संभव नहीं है हां इस पर शोध किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए ताकि पता तो चले की दाल में कल किसकी वजह से है अब ऐसा तो नहीं है कि नेता लोग यह गर्व करें कि या करने लगे कि मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं मेरी मर्जी… मैं चाहे संसद के अंदर गारियाऊं या संसद के बाहर गरियाऊं मेरी मर्जी’, लोकसभाध्यक्ष मुझे रोको नहीं, विपक्ष मुझे टोको नहीं मेरी मर्जी …। फिर टोका भी तो नहीं गया। वो बोलते रहे तो बोलते रहे। न उनके ख़िलाफ़ लोकसभा अध्यक्ष ने कार्रवाई की और न जिस पार्टी से वो सांसद थे उसके मुखिया ने। बल्कि उन्हें किसी प्रदेश में चुनाव प्रभारी बना दिया गया। ध्यान देने वाली बात है कि यह सब लोकसभा के अंदर विपक्ष के एक हुआ था। जिसको अमृत वचन कहे गए वो विपक्ष के दानिश अली थे। उनके साथ लगातार अभद्रता होती रही उनके (भाजपा) दल के किसी वरिष्ठ सांसद ने उन्हें न रोका न टोका। किसी ने नहीं कहा लोकसभा अध्यक्ष या भाजपा अध्यक्ष माफ़ी मांगे‌ं। नवनिर्मित लोकसभा भवन में गोली मारो… वाले अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी के लिए कहा,’जिन्हें जात का पता नहीं वे जातिगत जनगणना की बात कर रहे हैं और इसके पहले लोकसभा में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मजाक करते हुए खिल्ली उड़ाते हुए अपनी पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए कहा कि वह रीजन कोट पहनकर नहाते हैं तो संसद के भीतर ही कांग्रेस की नेता रेणुका चौधरी को की हंसी को तुलना सूपर्णखा (राक्षस) से की गई‌‌। यही नहीं जो व्यक्ति राजनीति में नहीं है उसके लिए भी उसे 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड कहा गया तो प्रियंका गांधी के पति राबर्ट वाड्रा पर भी भी टिप्पणी की गई। कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बज़ती तो इस तरह की बातें सिर्फ और सिर्फ एक तरफ से ही नहीं कही गई। दूसरे पक्ष ने पीएम मोदी को नाम लेकर या इशारा कर मौत का सौदागर और कांग्रेस की विधवा कहा गया तो राहुल गांधी को हाइब्रिड बछड़ा। यही नहीं बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आज तक पर चल रही लाइव डिबेट पर कांग्रेस के प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत की मां को रंडी कहते हुए उन्हें रंडी की औलाद (ग्रोक के अनुसार) कहा। क्या तब किसी ने, खास कर गृह मंत्री अमित शाह या पार्टी के मुखिया जे पी नड्डा ने अपने प्रवक्ता के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।

अब देखिए न देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अब तक कोसा जा रहा है। कोसने की हालत यह हो गई है कि उनके चरित्र पर भी हमला किया जा रहा है। नेताओं के बोल उनकी भाषा कब से बिगड़ी किसने इसकी शुरुआत की इसका इतिहास तो मिलना संभव नहीं है हां इस पर शोध किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए ताकि पता तो चले की दाल में कल किसकी वजह से है अब ऐसा तो नहीं है कि नेता लोग यह गर्व करें कि या करने लगे कि मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं मेरी मर्जी… मैं चाहे संसद के अंदर गारियाऊं या संसद के बाहर गरियाऊं मेरी मर्जी’, लोकसभाध्यक्ष मुझे रोको नहीं, विपक्ष मुझे टोको नहीं मेरी मर्जी …। फिर टोका भी तो नहीं गया। वो बोलते रहे तो बोलते रहे। न उनके ख़िलाफ़ लोकसभा अध्यक्ष ने कार्रवाई की और न जिस पार्टी से वो सांसद थे उसके मुखिया ने। बल्कि उन्हें किसी प्रदेश में चुनाव प्रभारी बना दिया गया। ध्यान देने वाली बात है कि यह सब लोकसभा के अंदर विपक्ष के एक हुआ था। जिसको अमृत वचन कहे गए वो विपक्ष के दानिश अली थे। उनके साथ लगातार अभद्रता हुई उनके दल के किसी वरिष्ठ सांसद ने उन्हें न रोका न टोका। किसी ने नहीं कहा लोकसभा अध्यक्ष या भाजपा अध्यक्ष माफ़ी मांगे‌। नवनिर्मित लोकसभा भवन में गोली मारो… वाले अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी के लिए कहा,’जिन्हें जात का पता नहीं वे जातिगत जनगणना की बात कर रहे हैं और इसके पहले लोकसभा में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मजाक करते हुए खिल्ली उड़ाते हुए अपनी पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए कहा कि वह रीजन कोट पहनकर नहाते हैं तो संसद के भीतर ही कांग्रेस की नेता रेणुका चौधरी को की हंसी को तुलना सूपर्णखा (राक्षस) से की गई‌‌। यही नहीं जो व्यक्ति राजनीति में नहीं है उसके लिए भी उसे 50 करोड़ या 500 करोड़ की गर्लफ्रेंड कहा गया तो प्रियंका गांधी के पति राबर्ट वाड्रा पर भी भी टिप्पणी की गई। कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बस्ती तो इस तरह की बातें सिर्फ और सिर्फ एक तरफ से ही नहीं कही गई दूसरे पक्ष में पीएम मोदी को नाम लेकर या इशारा कर मौत का सौदागर और कांग्रेस की विधवा कहा गया तो राहुल गांधी को हाइब्रिड बछड़ा। यही नहीं बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आज तक पर चल रही लाइव डिबेट पर कांग्रेस के प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत की मां को रंडी कहते हुए उन्हें रंडी की औलाद (ग्रोक के अनुसार) कहा। क्या तब किसी ने, खास कर गृह मंत्री अमित शाह या पार्टी के मुखिया जे पी नड्डा ने अपने प्रवक्ता के खिलाफ कार्रवाई की माफ़ी मांगने को कहा। इसी तरह एक चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस शैली में ममता बनर्जी जी को कहा दीदी तो दीदी क्या उनकी बॉडी लैंग्वेज को सामान्य कहा जा सकता है?

बहरहाल … मोदी की मां को गाली देने के मामले में बीजेपी-एनडीए ने बिहार का आह्वान किया वो भी आधे दिन का। खबरों के मुताबिक इसकी चपेट में आपातकालीन सेवाएं भी आयीं। गर्भवती महिला को ले जा रही एंबुलेंस तक को भी रोका गया। शिक्षिका के साथ भी बदसुलूकी की गई। ध्यान देने वाली बात ये भी है कि, बंद का आयोजन गुजरात में नहीं रखा गया, सिर्फ बिहार में ही रखा गया और अगला विधानसभा चुनाव में भी बिहार में ही है।

 

अरुण श्रीवास्तव देहरादून।

8218070103

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button