
मसूरी में जॉन लैंग की ऐतिहासिक कब्र को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग
देहरादून। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के ऑस्ट्रेलियाई मूल के वकील और प्रखर स्वतंत्रता समर्थक बैरिस्टर जॉन लैंग की 209वीं जयंती शनिवार को श्रद्धा और विचार-मंथन के साथ मनाई गई। इस अवसर पर मसूरी में स्थित जॉन लैंग की 161 वर्ष पुरानी जर्जर कब्र को राष्ट्रीय पुरातत्व महत्व का स्मारक घोषित करने की मांग प्रमुखता से उठी।
भारतीय इतिहास संकलन समिति के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने जॉन लैंग के जीवन, विचारों और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके साहसी योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि जॉन लैंग उन विरले विदेशी विद्वानों में से थे, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के अन्यायपूर्ण निर्णयों के विरुद्ध भारत के पक्ष में खुलकर आवाज उठाई।
रानी लक्ष्मीबाई के पक्ष में लड़ी ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई
कार्यक्रम में बताया गया कि जब अंग्रेजों ने दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर झांसी राज्य हड़पने का प्रयास किया, तब जॉन लैंग ने अंग्रेजी हुकूमत को अदालत में कानूनी चुनौती दी। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की कुटिल नीतियों को उजागर करते हुए न्याय और अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
रानी की मृत्यु के बाद 1860 में उन पर जो केस चलाया गया उसमें जॉन लैंग ने रानी को निर्दोष साबित कर दिया। अंग्रेज सरकार को मानना पड़ा कि रानी की कोई गलती नहीं थी।
जॉन लैंग ने अपनी एक किताब में बताया है कि उन्होंने झांसी की रानी को एक झलक देखा था। रानी से विचार विमर्श के दौरान वह रानी के सामने बैठे थे। बीच में पर्दा पड़ा था। इसी बीच रानी के दत्तक पुत्र ने अचानक पर्दा हटा दिया। जॉन लैंग ने देखा रानी बहुत सुंदर और बहुत बहादुर थीं।
1864 में मसूरी में उनकी रहस्यमयी मौत हो गई। हत्या का शक था, पर जांच दबा दी गई। उनकी कब्र आज भी मसूरी के कैमल्स बैक रोड पर मौजूद है। 1964 में लेखक रस्किन बॉन्ड ने उनकी कब्र खोजकर दुनिया को फिर से उनकी याद दिलाई।
जॉन लैंग पर पुस्तक का कवर पेज जारी
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता लॉ कॉलेज देहरादून के प्रोफेसर डॉ. अनिल दीक्षित ने जॉन लैंग के सिद्धांतों, वैचारिक दृढ़ता और भारत के प्रति उनके समर्पण पर विस्तृत व्याख्यान दिया। इस अवसर पर डॉ. दीक्षित द्वारा लिखित जॉन लैंग पर शीघ्र प्रकाशित होने वाली पुस्तक का कवर पेज भी जारी किया गया।
कार्यक्रम में भारतीय इतिहास संकलन समिति के महासचिव सुनील तिवारी, कृष्णा राजभर, मनोज त्रिपाठी, सुधीर तिवारी, आशुतोष नौटियाल सहित कई इतिहास प्रेमी, शिक्षाविद् और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।



