उत्तराखंड
Trending

सैकड़ो से हजारों में पहुंची भुतहा गांवों की संख्या

2000 में 100 गाँव थे निर्जन, अब संख्या पहुँची 1,700 से अधिक — पलायन बना सबसे बड़ा कारण

2000: लगभग 110 निर्जन गाँव

2011 (जनगणना): 1,048 निर्जन गाँव

2018 (पलायन आयोग): 1,700 गाँव तक निर्जन

2025: अनुमानित 1,700–1,900 निर्जन गाँव

सबसे प्रभावित जिले: पौड़ी, टिहरी, चमोली, अल्मोड़ा ।

देहरादून।

राज्य गठन के 25 साल बाद उत्तराखंड का एक कटु सच सामने है। यहां के सैकड़ों गाँव अब “भूतहा” कहलाने लगे हैं। 2000 में जब यह राज्य अस्तित्व में आया था, तब मुश्किल से 110 गाँव निर्जन माने जाते थे। लेकिन अब, 2025 तक यह संख्या बढ़कर 1,700 से अधिक हो चुकी है। यह आंकड़ा सिर्फ भूगोल का नहीं, बल्कि विकास और अवसरों की असमानता की गहरी कहानी कहता है।

गाँवों के खाली होने का सफर

2001 की जनगणना में लगभग 110–120 निर्जन गाँव दर्ज हुए थे।

2011 में यह संख्या बढ़कर 1,048 गाँव तक पहुँची, और उत्तराखंड प्रवासन आयोग की 2018 की रिपोर्ट ने बताया कि 700 से अधिक गाँव और सूने हो चुके हैं।

वर्तमान में अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, राज्य के पर्वतीय जिलों में 1,700–1,900 गाँव अब पूरी तरह वीरान हैं।

पौड़ी, टिहरी, चमोली और अल्मोड़ा जैसे जिलों में सबसे अधिक पलायन हुआ है। इनमें कई गाँव ऐसे हैं जहां अब सिर्फ बंद मकान और टूटते खेत ही बचे हैं।

पलायन की जड़ें गहरी हैं

राज्य के विकास का बोझ लंबे समय से मैदानों ने उठाया है, जबकि पहाड़ लगातार खाली होते गए।

रोज़गार के अवसरों की कमी, बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य की तलाश और खेती की घटती उपयोगिता ने युवाओं को शहरों की ओर धकेल दिया।

2013 की आपदा के बाद कई परिवार स्थायी रूप से नीचे उतर आए। ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ी और गाँवों की जीवनधारा सूख गई।

सरकारी प्रयास और सच्चाई

राज्य सरकार ने वर्षों में “रिवर्स माइग्रेशन” के कई अभियान चलाए — जैसे

होम-स्टे योजना, गाँव अपनाओ अभियान, और पलायन आयोग का गठन।

कुछ गाँवों (जैसे चैंपा, खीमल, चौंदली आदि) में पर्यटन और हस्तशिल्प से लोग लौटे भी हैं, पर यह संख्या बहुत कम है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बिना स्थानीय उद्योग, सड़क और डिजिटल कनेक्टिविटी के इन प्रयासों का असर सीमित रहेगा।

एक राज्य, दो दुनिया

गौर करने की बात है कि राज्य के मैदानों — देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल के तराई क्षेत्रों — में आबादी तेज़ी से बढ़ी है। जबकि पहाड़ी जिलों में गाँव वीरान हो रहे हैं।

यह असंतुलन आने वाले समय में जनसांख्यिकीय संकट का कारण बन सकता है। सीमावर्ती इलाकों में यह स्थिति सुरक्षा चिंता भी बन रही है।

आगे का रास्ता

उत्तराखंड को अपने 25वें वर्ष में यह आत्ममंथन करना होगा कि विकास की रोशनी पहाड़ों तक क्यों नहीं पहुँची।

विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि “एक जिला, एक उत्पाद”, स्थानीय खेती को मूल्य श्रृंखला से जोड़ना, और युवा उद्यमिता को बढ़ावा देना ही इस “भूतहा” भविष्य से बचने का रास्ता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button