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उत्तराखंड की भाषाओं को विदेशों में नई पहचान

प्रवासी बच्चे सीखेंगे गढ़वाली कुमाऊनी और जौनसारी, कनाडा में शुरू हुआ ‘एआई सक्षम भाषा शिक्षण केंद्र’ प्रोजेक्ट 

देवभूमि उत्तराखंड कल्चरल सोसाइटी कनाडा की पहल, पद्मश्री प्रीतम भारतवाण की ‘जागर अकादमी’ से होंगे केंद्र संबद्ध

उत्तराखंड की लोकभाषा, परंपरा और पहचान को वैश्विक मंच पर जीवित रखने के उद्देश्य से कनाडा में एक अनूठा सांस्कृतिक आंदोलन शुरू हुआ है। देवभूमि उत्तराखंड कल्चरल सोसाइटी कनाडा ने ‘एआई सक्षम भाषा शिक्षण केंद्र’ प्रोजेक्ट की शुरुआत की है, जिसके तहत विदेशों में रहने वाले प्रवासी बच्चों को गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी भाषाएँ सिखाई जाएँगी। यह पहल आधुनिक तकनीक और लोक संस्कृति के संगम का प्रतीक बन रही है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का सेतु बनेगी।

देवभूमि उत्तराखंड कल्चरल सोसाइटी कनाडा ने टोरंटो में ‘एआई सक्षम भाषा शिक्षण केंद्र’ (AI-enabled Language Learning Centers) प्रोजेक्ट का औपचारिक शुभारंभ किया। इस परियोजना के तहत कनाडा और अमेरिका में ऐसे केंद्र स्थापित किए जाएंगे जहाँ प्रवासी बच्चे आधुनिक तकनीक की सहायता से अपनी मातृभाषाएँ — गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी — सीख सकेंगे। सभी केंद्र पद्मश्री प्रीतम भारतवाण जी की ‘जागर अकादमी’ से संबद्ध रहेंगे, जिससे पारंपरिक लोक संस्कृति को नई तकनीकी ऊर्जा मिलेगी।

सोसाइटी के अध्यक्ष बिशन खंडूरी ने कहा कि “यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि इस ऐतिहासिक लॉन्च की मेजबानी का अवसर हमारी संस्था को मिला। यह पहल विदेशों में रह रहे उत्तराखंडियों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखेगा।”

खंडूरी ने कहा कि सोसाइटी हर उस व्यक्ति का स्वागत करती है — चाहे वह इंजीनियर हो, भाषा विशेषज्ञ, लोक कलाकार, समाजसेवी या व्यवसायी — जो अपनी मातृभूमि और संस्कृति से गहराई से जुड़ा रहना चाहता है।

कार्यक्रम में सोसाइटी के पदाधिकारी शिव सिंह ठाकुर (उपाध्यक्ष), विपिन कुकरेती (महामंत्री), उमेद कठैत, जगदीश सेमवाल, गिरीश रतूड़ी, रमेश नेगी, जीत राम रतूड़ी, विनोद रौंतेला और अन्य सदस्य उपस्थित रहे।

भारत से ऑनलाइन जुड़े मस्तू दास, शक्ति प्रसाद भट्ट, के.एस. चौहान सहित प्रोजेक्ट की कोर टीम ने इस पहल को दिशा देने में अहम भूमिका निभाई।

कनाडा के स्थानीय मीडिया, भारतीय दूतावास के प्रतिनिधि, तकनीकी विशेषज्ञों, सांस्कृतिक संस्थाओं और बड़ी संख्या में प्रवासी उत्तराखंडियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।

अंत में सोसाइटी ने अपने संदेश में कहा कि “यह पहल केवल तकनीक के प्रयोग तक सीमित नहीं, बल्कि अपनी भाषा, पहचान और लोक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का एक सशक्त जन आंदोलन है।”

 

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