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पहाड़ों में गूंजी डुमका की चीख

डुमक की पुकार: पत्नी को बचाने में शहीद हुए सुंदर सिंह, सड़कहीन गांव में इंसानियत बनी एकमात्र सहारा

चमोली जनपद के जोशीमठ ब्लॉक के अत्यंत दुर्गम डुमक गांव से गुरुवार की सुबह आई एक खबर ने पूरे पहाड़ को भीतर तक हिला दिया। यह केवल एक भालू के हमले की खबर नहीं थी, बल्कि उस सच्चाई की गूंज थी कि आज भी कुछ गांव ऐसे हैं, जहां तक पहुंचना जीवन और मौत के बीच फर्क तय कर देता है।

सुंदर सिंह और उनकी पत्नी लीला देवी रोज़ की तरह सुबह जंगल में घास काटने गए थे। अचानक झाड़ियों से एक जंगली भालू निकल पड़ा और लीला देवी पर हमला कर दिया। पत्नी की चीख सुनते ही सुंदर सिंह बिना किसी हथियार के उस खूंखार भालू से भिड़ गए। उन्होंने अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए मौत को गले लगा लिया। कुछ ही पलों में वह लहूलुहान होकर ज़मीन पर गिर पड़े — लेकिन लीला देवी बच गईं।

लीला देवी की हालत गंभीर थी। गांव वाले उन्हें किसी तरह घाटियों और पथरीले रास्तों से होते हुए गांव तक लाए। वहां न एंबुलेंस थी, न सड़क — केवल इंसानियत और हिम्मत थी। चार लोग कंधे पर उठाकर कई किलोमीटर तक उन्हें ले गए। प्रशासन को सूचना मिली, तो हेलीकॉप्टर भेजना पड़ा। ऋषिकेश एम्स तक पहुंचने में घंटों लग गए, तब तक पूरा गांव मंदिर के बाहर प्रार्थना में खड़ा था।

डुमक गांव आज भी विकास के नक्शे पर सिर्फ एक नाम है — न सड़क, न स्वास्थ्य केंद्र, न आपातकालीन सेवा। मोबाइल नेटवर्क तक नहीं पहुंचता। ऐसे में किसी दुर्घटना का मतलब है जीवन और मृत्यु के बीच लंबा इंतजार। ग्रामीणों का कहना है, “सुंदर सिंह की मौत भालू से ज़्यादा उस बेबस व्यवस्था की वजह से हुई, जो हमारे गांव तक अब तक नहीं पहुंची।”

वन विभाग और प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची है, लेकिन लोगों की मांग सिर्फ जांच या मुआवज़े तक सीमित नहीं — वे चाहते हैं कि डुमक को अब मुख्यधारा की सुविधा मिले।

आज सुंदर सिंह का बलिदान केवल एक पति का नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों का प्रतीक बन गया है जो पहाड़ में हर दिन जंगली जानवरों, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और संसाधनों की कमी से जूझते हैं।

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