
गाँव की पगडंडियों पर चलते हुए किसी बुजुर्ग से अगर पूछ लिया जाए कि बरसात कितनी होगी, तो वे मौसम विभाग का हवाला नहीं देंगे। वे इशारा करेंगे खेत की मेड़ पर बैठे उस छोटे से पक्षी की ओर, जिसके अंडे सदियों से ग्रामीणों के लिए संकेत बने हुए हैं। कहते हैं कि जितने अंडे, उतनी ही बरसात। इस साल जब उस चिड़िया ने ज़्यादा अंडे दिए थे, तब ही लोग मान बैठे थे कि पानी अबकी आफ़त बनकर बरसेगा—और हुआ भी वही।
लोकविश्वास की जड़ें और ग्रामीणों का यकीन
गाँवों में आज भी कई लोग मौसम की चाल समझने के लिए इस पक्षी पर नज़र रखते हैं। खेतों के बीच टिटिहरी जैसी दिखने वाली यह चिड़िया जब अंडे देती है तो ग्रामीण कहते हैं कि आने वाले मानसून का संकेत वही है। कई बुज़ुर्ग मानते हैं कि उनके बचपन से लेकर अब तक यह विश्वास कम ही बार ग़लत साबित हुआ है। यही वजह है कि जब इस बार अंडों की संख्या बढ़ी, गाँव के लोग पहले से ही चिंता में थे।
कितने अंडे, कैसी बारिश?
गाँव की मान्यता के अनुसार चिड़िया के अंडों से ही बारिश की भाषा समझी जाती है—
- एक अंडा – मौसम सामान्य और सुखद रहेगा।
- दो अंडे – हल्की-हल्की बारिश या फुहारें होंगी।
- तीन अंडे – अच्छी बारिश की संभावना।
- चार अंडे – तेज़ बरसात और खेत-खलिहान भरने का संकेत।
- पाँच या अधिक अंडे – तबाही लाने वाली भारी बरसात का अंदेशा।
मौसम का जीता जागता कैलेंडर है यह चिड़िया
ग्रामीण मानते हैं कि यह चिड़िया मौसम का जीवित कैलेंडर होती है, क्योंकि इसकी गतिविधियों से बरसात के रुख का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यह चिड़िया अक्सर घरों की छतों, आँगन या पेड़ों की नीची डालियों पर घोंसला बनाती है ताकि लोग आसानी से उसके अंडे गिनकर संकेत समझ सकें।
बुज़ुर्ग कहते हैं कि यह चिड़िया जिस दिशा में उड़ान भरती है, अक्सर उसी ओर से बादल आते हैं।
आद्रा नक्षत्र से पहले होता है टिटहरी का प्रसव काल
ज्योतिष शास्त्रों में भी यही माना जाता है कि जब सूर्य देव आद्रा नक्षत्र में प्रवेश करते हैं तो मानसून की गतिविधि शुरू हो जाती है. आद्रा नक्षत्र से पहले टिटहरी का प्रसव काल होता है. टिटहरी का प्रजनन काल मार्च से जून महीने तक होता है, जिसमें टिटहरी अंडे देती है. इस दौरान बुजुर्ग लोग मई महीने के अंत में टिटहरी के अंडे देखकर अंदाजा लगाते हैं की बारिश कब और कितनी होगी. ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों का कहना कि खेत की जुताई करते समय यदि किसान को टिटहरी के अंडे दिख जाए तो वे उस जगह की जुताई नहीं करते न ही इसे कोई नुकसान पहुंचाते हैं।
खतरे की घंटी है इसकी आवाज
यह पक्षी स्थानीय लोगों के बीच किलकिला नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि यदि यह पक्षी घर की छत के ऊपर से अपनी “हुटिटी-टी, हुटिटी-टी” जैसी आवाज निकालते हुए उड़ जाए, तो उस घर में क्लेश, झगड़े या अनहोनी घटित हो सकती है। इसी कारण लोग इसे अशुभ संकेत मानते हैं और इसकी आवाज को खतरे की घंटी की तरह देखते हैं।
तबाही का मौसम और सच होते डर
ग्रामीणों का डर बेवजह नहीं था। इस बार की बरसात ने पूरे उत्तर भारत में तबाही मचाई। खेत डूब गए, सड़कें बह गईं और गाँवों के गाँव कटकर रह गए। गाँव के ही किसान रामलाल कहते हैं – “हम तो तभी समझ गए थे कि मुसीबत आने वाली है, जब चिड़िया ने लगातार पाँच अंडे दिए। इतनी बारिश हमने सालों से नहीं देखी थी।”
उत्तरखंड ही नहीं, पूरे उत्तर भारत में बरपा कहर
उत्तराखंड की पहाड़ियों से लेकर मैदानों तक बारिश ने कहर ढाया, लेकिन सबसे बड़ा दर्द हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और पंजाब के लोगों ने भी झेला। हाल ही में वैष्णो देवी मार्ग पर हुए भूस्खलन में 34 से अधिक लोगों की जान गई। उससे पहले किश्तवाड़ ज़िले में बादल फटने से चुरैल माता मंदिर के पास कई लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लापता हो गए। यह घटना लोगों को वर्षों पुरानी त्रासदी की याद दिला गई। वहीं पंजाब के कई ज़िलों में नदियाँ उफान पर हैं और धान की फ़सल पूरी तरह बर्बाद हो गई।
लोककथा और विज्ञान के बीच
मौसम वैज्ञानिक कहते हैं कि पक्षियों का व्यवहार अक्सर बदलते मौसम का संकेत देता है। वे मानते हैं कि यह वैज्ञानिक भविष्यवाणी तो नहीं, लेकिन प्रकृति से गहरे जुड़े जीव-जंतु कभी-कभी मौसम के संकेत पहले ही भाँप लेते हैं। ग्रामीणों का विश्वास और इस साल का अनुभव, दोनों मिलकर एक बार फिर साबित करते हैं कि लोककथाओं और प्रकृति का रिश्ता कितना मज़बूत है।
आखिरकार…
बरसात थम जाएगी, नदियाँ अपनी धार में लौटेंगी, लेकिन गाँवों में यह चर्चा लंबे समय तक ज़िंदा रहेगी कि “देखा था ना, अंडों से पहले ही अंदाज़ा हो गया था।”
शायद यही प्रकृति का अपना विज्ञान है, जिसे किताबों में नहीं बल्कि खेतों और मेड़ों पर लिखा गया है।




