गनर्स डे : 200 साल की गौरवगाथा, तोपों की गर्जना से लिखी भारतीय सेना की शौर्य कहानी

मेरठ। भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी के लिए 28 सितंबर का दिन बेहद गौरवपूर्ण है। इसी दिन भारतीय तोपखाने की उस परंपरा की नींव पड़ी थी, जिसने युद्धभूमि में अपनी मारक क्षमता, साहस और अदम्य शौर्य से भारतीय सेना को मजबूती दी। स्थापना दिवस के अवसर पर देश के विभिन्न सैन्य छावनी क्षेत्रों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। आर्टिलरी रेजिमेंट इस दिवस को ‘गनर्स डे’ के रूप में मनाती है।
रिसर्च फाउंडेशन ऑफ डिफेंस एडमिनिस्ट्रेशन की ओर से आयोजित सेमिनार में ‘भारतीय सशस्त्र सेनाओं के लिए संसद द्वारा बनाए गए सेना अधिनियम-1950 एवं सेना नियम-1954 के तहत अनुशासन, आचरण, कोर्ट मार्शल और सेवा संबंधी प्रशासनिक कार्यों के नियंत्रण में सैनिक अदालत की भूमिका’ विषय पर व्याख्यान देते हुए देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी, देहरादून के डीन लॉ प्रो. (डॉ.) अनिल कुमार दीक्षित ने आर्टिलरी रेजिमेंट की गौरवगाथा पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि ‘सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल’ के आदर्श वाक्य को चरितार्थ करने वाली आर्टिलरी रेजिमेंट के प्रत्येक गनर पर देश का हर नागरिक गर्व करता है।
गनर यानी तोप का योद्धा
आम बोलचाल में ‘गनर’ शब्द बंदूक से जुड़ा माना जाता है, लेकिन सेना के संदर्भ में गन का अर्थ तोप है। सेना में तोपों को संचालित करने और उन्हें युद्धभूमि में इस्तेमाल करने वाले सैनिकों को गनर या तोपची कहा जाता है। गनर का पद सेना की तोपखाना रेजिमेंट, सेना वायु रक्षा रेजिमेंट और बख्तरबंद रेजिमेंट में होता है।
भारतीय सेना की तोपें भारी वजन वाली और लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम होती हैं। आधुनिक दौर में भारतीय आर्टिलरी ने अपनी क्षमता और तकनीक में लगातार बदलाव किया है और आज यह सेना की महत्वपूर्ण मारक शक्ति में शामिल है।
पानीपत से आधुनिक आर्टिलरी तक का सफर
भारत में तोपखाने के शुरुआती इस्तेमाल का श्रेय मुगल सम्राट बाबर को दिया जाता है। वर्ष 1526 में पानीपत की लड़ाई में बाबर ने तोपखाने का इस्तेमाल कर इब्राहिम लोदी की सेना को पराजित किया था। हालांकि, भारत में इससे पहले भी विभिन्न युद्धों में तोपों के इस्तेमाल के उल्लेख मिलते हैं।
आधुनिक भारतीय आर्टिलरी रेजिमेंट की ऐतिहासिक नींव 28 सितंबर 1827 को रखी गई थी। शुरुआत 2.5 इंच की तोपों से हुई और समय के साथ यह शाखा अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों से लैस होती गई। इसी स्थापना दिवस को भारतीय सेना में गनर्स डे के रूप में मनाया जाता है।
1857 के विद्रोह से विश्व युद्ध तक
रॉयल इंडियन आर्टिलरी का गठन 28 सितंबर 1827 को बॉम्बे प्रेसीडेंसी की बॉम्बे आर्मी के हिस्से के रूप में हुआ था। बाद में इसका नाम बदलकर 5 बॉम्बे माउंटेन बैटरी कर दिया गया।
1857 का विद्रोह मेरठ से शुरू हुआ और बंगाल आर्टिलरी के कई भारतीय सैनिक भी इसमें शामिल हुए। इसके बाद तत्कालीन भारतीय तोपखाने के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हुई।
द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय गनरों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके योगदान के लिए उन्हें विक्टोरिया क्रॉस, जॉर्ज मेडल, मिलिट्री क्रॉस, इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट, इंडियन डिस्टिंग्विश्ड सर्विस मेडल, मिलिट्री मेडल और अन्य वीरता सम्मान मिले। युद्ध में भारतीय तोपखाने के योगदान को देखते हुए वर्ष 1945 में इसे प्रतिष्ठित ‘रॉयल’ उपाधि दी गई। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद इसके नाम से ‘रॉयल’ शब्द हटा दिया गया।
हर युद्ध में निभाई अहम भूमिका
भारतीय आर्टिलरी रेजिमेंट ने 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध तथा ऑपरेशन विजय समेत विभिन्न सैन्य अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय की जरूरत के अनुसार आर्टिलरी का लगातार पुनर्गठन भी होता रहा। 1964 में तटीय तोपखाने को भारतीय नौसेना को सौंपा गया। इसके बाद 1986 में आर एंड ओ फ्लाइट तथा 1994 में सेना वायु रक्षा कोर भारतीय आर्टिलरी से अलग होकर सेना की स्वतंत्र शाखाएं बनीं।
‘युद्ध का भगवान’ कही जाती है आर्टिलरी
प्रो. अनिल दीक्षित ने कहा कि भारतीय आर्टिलरी देश की दूसरी सबसे बड़ी लड़ाकू शाखा है। युद्धभूमि में गनर भारी गोलाबारी के जरिए दुश्मन की बढ़त को रोकने और अपनी सेना को आगे बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध कराते हैं। इसी कारण आर्टिलरी को अक्सर ‘युद्ध का भगवान’ कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय आर्टिलरी ने देश के लिए लड़े गए युद्धों और सैन्य अभियानों में असाधारण साहस, सर्वोच्च बलिदान और अदम्य शौर्य का परिचय दिया है। रेजिमेंट को एक विक्टोरिया क्रॉस, एक अशोक चक्र, सात महावीर चक्र, आठ कीर्ति चक्र, 92 वीर चक्र, तीन युद्ध सेवा पदक, 56 शौर्य चक्र और 441 सेना पदकों सहित अनेक वीरता सम्मानों से गौरवान्वित किया जा चुका है।
‘सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल’ के आदर्श वाक्य के साथ भारतीय आर्टिलरी की यह गौरवशाली परंपरा आज भी देश की सुरक्षा और सैन्य शक्ति का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है।




