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खामोश घर, टूटी उम्मीदें : अकेली ज़िंदगी का दर्दनाक अंत

हरिद्वार के ज्वालापुर क्षेत्र की एक शांत सी कॉलोनी… बंद दरवाज़ा… और भीतर पसरा ऐसा सन्नाटा, जिसने पूरे मोहल्ले को झकझोर कर रख दिया। आर्यनगर कॉलोनी के एक पुश्तैनी घर से 65 वर्षीय बुज़ुर्ग महिला की मौत की ऐसी खबर सामने आई, जिसने सिर्फ पुलिस ही नहीं, बल्कि समाज के दिल को भी सवालों से भर दिया।
बताया जा रहा है कि महिला कई सालों से अकेली रह रही थीं। उम्र ढल चुकी थी । घर का आंगन, दीवारें और पुरानी यादें ही उनका सहारा थीं। बेटों की दुनिया अब अलग शहरों में बस चुकी थी। एक फरीदाबाद में नौकरी में व्यस्त, तो दूसरा दिल्ली में अपनी जिंदगी में। फोन पर बात ही शायद रिश्तों की आखिरी डोर बनकर रह गई थी।

एक महीना… सिर्फ घंटी बजती रही
कहानी तब पलटी जब बेटों ने लगातार फोन किए, लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं मिला। शुरू में शायद लगा होगा — माँ नाराज़ होंगी, या कहीं गई होंगी… लेकिन जब दिन हफ्तों में बदले, तो अनहोनी का डर हकीकत बनता नजर आया।
नोएडा से बेटा जब हरिद्वार पहुँचा, तो घर का दरवाज़ा अंदर से बंद था। पड़ोसियों की मदद से जब दरवाजा तोड़ा गया, तो अंदर का दृश्य किसी को भी अंदर तक हिला देने के लिए काफी था। पूरे घर में तेज बदबू फैली थी और महिला का शव कंकाल जैसी स्थिति में पड़ा था। वक्त ने चुपचाप अपना काम कर दिया और किसी को भनक तक न लगी।

पुलिस जांच और अनुत्तरित सवाल
सूचना मिलते ही ज्वालापुर कोतवाली प्रभारी कुंदन सिंह राणा टीम के साथ मौके पर पहुंचे। प्रारंभिक जांच में इसे सामान्य मौत माना जा रहा है। संभवतः बीमारी या अचानक स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण। हालांकि शव पुराना होने की वजह से सच्चाई पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगी।

सबसे बड़ा सवाल — रिश्ते आखिर कहाँ रह गए?
यह सिर्फ एक मौत नहीं… बल्कि बदलते समाज का आईना भी है।
एक मां, जिसने कभी बच्चों के लिए अपनी दुनिया समेट ली होगी, आखिर अपने आखिरी दिनों में अकेली क्यों रह गई?
फोन की घंटियाँ बजती रहीं… मगर किसी ने दरवाज़ा नहीं खटखटाया।
समय गुजरता रहा… और एक ज़िंदगी खामोशी में गुम हो गई।
इस घटना ने मोहल्ले के लोगों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है — क्या सिर्फ फोन कर लेना ही आज रिश्तों की जिम्मेदारी रह गई है?
कभी-कभी दूरी किलोमीटर में नहीं, संवेदनाओं में होती है… और जब तक एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

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