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मिटकर अमर हो गई नन्हीं परी, आठ दिन की बेटी को खोकर भी माता-पिता ने चुना मानवता का रास्ता

चमोली के दंपती ने गम के सबसे अंधेरे क्षण में लिया सबसे उजला फैसला, मेडिकल छात्रों की पढ़ाई के लिए दान की नवजात की देह

देहरादून। कहते हैं कुछ फैसले इंसान को तोड़ नहीं, बल्कि उसे और ऊंचा उठा देते हैं। ऐसा ही एक फैसला चमोली जिले के एक साधारण दंपति ने उस वक्त लिया, जब उनके जीवन का सबसे अनमोल हिस्सा उनसे छिन चुका था।
महज आठ दिन पहले श्रीनगर बेस अस्पताल में जब नन्हीं बच्ची ने जन्म लिया, तो माता हंसी और पिता संदीप राम की दुनिया खुशियों से भर उठी। घर में जश्न का माहौल था, सपने बुने जा रहे थे, लेकिन किसे पता था कि नियति इतनी क्रूर साबित होगी। जन्म के साथ ही बच्ची एक गंभीर आंतरिक बीमारी से जूझने लगी। बेहतर इलाज की उम्मीद में परिजन उसे एम्स ऋषिकेश लाए। डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की, जटिल सर्जरी भी हुई, लेकिन अंततः मासूम जिंदगी की जंग हार गई।
अपनी गोद सूनी होने का दर्द शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। मां बदहवास थी, पिता की आंखें सूख चुकी थीं। उसी समय एम्स के नर्सिंग स्टाफ के माध्यम से मोहन फाउंडेशन के प्रोजेक्ट लीडर संचित अरोड़ा और लायंस क्लब ऋषिकेश देवभूमि के चार्टर अध्यक्ष गोपाल नारंग परिजनों से मिले। उन्होंने देहदान के महत्व को बेहद संवेदनशीलता के साथ समझाया।
दुख के उस अथाह सागर में डूबे माता-पिता ने कुछ पल सोचा… और फिर एक ऐसा निर्णय लिया, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। उन्होंने अपनी आठ दिन की बेटी की देह चिकित्सा शिक्षा के लिए दान करने की सहमति दे दी।

नवजात के पिता संदीप राम कहते हैं,
“हम अपने बच्चे को नहीं बचा सके, यही हमारे जीवन का सबसे बड़ा दुख है। लेकिन अगर उसकी देह से पढ़ाई कर कोई डॉक्टर किसी और मासूम की जान बचा सके, तो हमें लगेगा कि हमारी बेटी व्यर्थ नहीं गई।”

एम्स ऋषिकेश के एनाटॉमी विभाग को नवजात की देह सौंप दी गई, जहां मेडिकल छात्र उसके माध्यम से अध्ययन और शोध कर सकेंगे। एम्स के पीआरओ डॉ. श्रीलॉय मोहंती के अनुसार, यह देहदान चिकित्सा शिक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।
यह पहला मौका नहीं है जब उत्तराखंड में माता-पिता ने ऐसा साहसिक निर्णय लिया हो। इससे पहले देहरादून में ढाई दिन की बच्ची और वर्ष 2025 में पांच दिन के नवजात का देहदान भी समाज के सामने मिसाल बन चुका है। लेकिन हर बार यह फैसला उतना ही कठिन और उतना ही महान होता है।
इस नन्हीं बच्ची का जीवन भले ही कुछ दिनों का रहा, लेकिन उसके माता-पिता के इस निर्णय ने उसे अमर बना दिया। वह अब किसी एक परिवार की बेटी नहीं, बल्कि आने वाले अनगिनत मरीजों की उम्मीद बन चुकी है।

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