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सुप्रीम कोर्ट सख्त: लावारिस कुत्तों को शेल्टर होम में रखें, विरोध करने पर कार्रवाई

दिल्ली-एनसीआर में कुत्तों की संख्या लाखों, काटने की घटनाएँ और रैबीज़ से मौतें बढ़ीं

 

आदेश लागू करना चुनौतीपूर्ण, विरोध पकड़ रहा जोर 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर देशभर में लावारिस कुत्तों को लेकर सख्ती दिखाई है। अदालत ने साफ कहा है कि सड़कों से इन कुत्तों को हटाकर शेल्टर होम में रखा जाए और यदि कोई इस प्रक्रिया में बाधा डालता है, तो उस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी पशु के प्रति क्रूरता नहीं, बल्कि आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

क्यों लेना पड़ा सुप्रीम कोर्ट को स्वत संज्ञान 

देश में आवारा कुत्तों के हमले और रेबीज से मौत के मामले लगातार बढ़ते गए हैं। 2020 से 2024 के बीच देशभर में करीब 37 लाख डॉग-बाइट के मामले दर्ज हुए। हर साल औसतन 5,700 लोगों की मौत रेबीज से हो रही है, जबकि 2025 की शुरुआत में ही ये आंकड़ा चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया। संसद में पेश रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ दिल्ली में ही पिछले एक साल में 54 संदिग्ध मौतें दर्ज हुईं। गली-मोहल्लों में कुत्तों के झुंड के हमले, बच्चों और बुजुर्गों की जान लेने और हजारों लोगों को घायल करने जैसी घटनाएं आम हो गईं। आवारा कुत्तों की उपस्थिति ने बच्चों और बुज़ुर्गों की हरकतों को सीमित कर दिया  है । पार्कों और सड़कों पर निकलना डरावना हो गया है। कुछ लिंक्ड RWAs इस आदेश का स्वागत भी कर चुके हैं। ऐसे हालात में आम जनता की सुरक्षा को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट को खुद इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा।

“राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बताया क्रूर, दी नसबंदी-टीकाकरण की सलाह”

“सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली-एनसीआर से सभी आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश मानवीय और विज्ञान-आधारित नीति के दशकों पुराने सफर से पीछे हटने जैसा है। ये बेज़ुबान जीव कोई ‘समस्या’ नहीं हैं जिन्हें मिटा दिया जाए। आश्रय, नसबंदी, टीकाकरण और सामुदायिक देखभाल से बिना क्रूरता के सड़कों को सुरक्षित रखा जा सकता है। इस तरह का सामूहिक हटाया जाना क्रूर, दूरदृष्टिहीन है और हमारी करुणा को छीन लेता है। हम सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण – दोनों को साथ-साथ सुनिश्चित कर सकते हैं।”

विरोध के स्वर भी तेज

इस आदेश का कई स्तरों पर विरोध हो रहा है। कई एनिमल वेलफेयर संगठनों ने दावा किया है कि शेल्टर होम की कमी, संसाधनों की कमी और उचित प्रबंधन न होने से कुत्तों की हालत और खराब हो जाएगी। पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि समाधान मानवीय होना चाहिए और नसबंदी व टीकाकरण जैसे दीर्घकालिक उपायों पर जोर दिया जाना चाहिए। India Gate पर प्रदर्शन और गिरफ्तारी हुई , कई ने इसे “death warrant” तक बताया। जान्हवी कपूर, वरुण धवन जैसे सेलिब्रिटीज ने ऑनलाइन विरोध जारी रखा। PETA इंडिया ने इसे “impractical, illogical, illegal” बताया और कहा यह विस्थापन कभी काम नहीं करेगा।

आदेश लागू करने में आने वाली चुनौतियां

  • शेल्टर होम की कमी: अधिकांश नगर निगमों के पास पर्याप्त शेल्टर नहीं हैं
  • गुरुग्राम में केवल 100 शेल्टर स्पॉट हैं, जबकि वहां लगभग 50,000 आवारा कुत्ते estimated हैं।
  • बजट और संसाधन: पशुओं की देखभाल के लिए फंडिंग और प्रशिक्षित स्टाफ की भारी कमी है।
  •  पूरे NCR में शेल्टर स्थापित करने की अनुमानित लागत ₹15,000 करोड़ है। नगर निगम तैयार नहीं थे ऐसी जल्दी में इतनी बड़ी योजना के लिए।
  • स्थानीय विरोध: कई इलाकों में लोग कुत्तों को हटाने का विरोध करते हैं, जिससे नगर निगम की टीमों को काम में दिक्कत आती है।
  • लॉजिस्टिक दिक्कतें: हजारों कुत्तों को सुरक्षित तरीके से पकड़ना, ट्रांसपोर्ट करना और देखभाल करना आसान नहीं है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह आदेश “vacuum effect” पैदा कर सकता है — खाली जगह पर और अधिक आक्रामक कुत्ते आ सकते हैं— साथ ही हॉलेलिस्टिक नसबंदी और टीकाकरण प्रोग्राम को हटाना ज़ूनोटिक जोखिम बढ़ा सकता है।

अदालत की चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि किसी भी हाल में आदेश की अवहेलना बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सीन्टिमेंट्स नहीं चलेगी”: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में किसी भी भावुकता को प्रवेश नहीं मिलेगा; बाधा डालने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और contempt proceedings हो सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति, संगठन या संस्था कुत्तों को हटाने में बाधा बनेगा, तो उसके खिलाफ कानून के तहत सख्त कार्रवाई होगी। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से मिलकर ठोस और मानवीय योजना तैयार करने को कहा है, ताकि न तो इंसानों की सुरक्षा से समझौता हो और न ही जानवरों के अधिकारों का हनन।

यह आदेश एक ऐतिहासिक, लेकिन विवादास्पद मोड़ है—जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने मानव सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एक सख्त कदम उठाया है। लेकिन इसे लागू करना जमीनी हकीकतों, वित्तीय और संगठनात्मक बाधाओं, और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।

 

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