तिरुपति लड्डू प्रसादम केस: SIT जांच में घी में नहीं मिला एनिमल फैट
एफएसएसएआई की जांच में भी नहीं मिले मिलावट के प्रमाण

रुड़की की भोले बाबा आर्गेनिक डेयरी मिल्क कंपनी ने भी सप्लाई किया था घी
देहरादून। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित विशेष जांच दल (SIT) ने तिरुपति लड्डू प्रसादम मामले की जांच में पाया कि आपूर्ति किए गए घी में एनिमल फैट (पशु वसा) या लार मौजूद नहीं थी। यह रिपोर्ट अदालत में पेश की गई, जिससे मामले में घसीटी गई कंपनियों को बड़ी राहत मिली है।
जांच रिपोर्ट में विशेष रूप से रुड़की की प्रतिष्ठित भोले बाबा ऑर्गेनिक डेयरी मिल्क प्राइवेट लिमिटेड के घी को लेकर कहा गया कि उसमें एनिमल फैट या लार के कोई प्रमाण नहीं मिले। यह मामला तब चर्चा में आया था, जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया था कि पिछली सरकार के दौरान तिरुपति में लड्डू बनाने के लिए पशु वसा युक्त घी का इस्तेमाल हुआ। बयान से करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हुईं, जिसके बाद अक्टूबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने 5 सदस्यीय SIT का गठन किया। इसमें CBI के 2, आंध्र प्रदेश पुलिस के 2 और एफएसएसएआई के एक अधिकारी शामिल थे।
जांच में यह भी सामने आया कि तमिलनाडु की एआर डेयरी फूड प्रा.लि. के साथ-साथ भोले बाबा डेयरी का नाम भी साजिशन विवाद में घसीटा गया। कंपनी ने उस समय सभी आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए इसे उनकी साख खराब करने की कोशिश करार दिया था। हालांकि, NDDB Calf Lab ने सैंपल खुद एकत्र नहीं किया था, जिसके कारण रिपोर्ट की कानूनी वैधता पर प्रश्नचिन्ह है। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने भी जांच अधिकारी को इस जांच के लिए अधिकृत नहीं माना और कंपनी के मालिक को रिहा कर दिया।
गुणवत्ता पर समझौता नहीं करती कंपनी
भोले बाबा ऑर्गेनिक डेयरी मिल्क प्रा.लि. का अब तक एफएसएसएआई की किसी भी जांच में एक भी सैंपल फेल नहीं हुआ है। कंपनी का कहना है कि उनकी प्राथमिकता हमेशा गुणवत्ता और शुद्धता बनाए रखना रही है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
30 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि वाईएसआरसीपी शासनकाल में लड्डू में पशु वसा मिलाए जाने का कोई ठोस सबूत नहीं है। कोर्ट ने मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू द्वारा बिना पुख्ता प्रमाण के सार्वजनिक बयान देने पर भी सवाल उठाया। अदालत ने कहा, “लैब रिपोर्ट में स्पष्टता नहीं है… अगर आपने खुद जांच का आदेश दिया था, तो मीडिया में बयान देने की क्या जरूरत थी?” अदालत की इस टिप्पणी से साफ है कि शुरुआती आरोप जल्दबाजी में और बिना ठोस आधार के लगाए गए थे।



