दो सेब और हैंड वॉश की ‘महाचोरी’!
लाहौर के जज के चैंबर से सामान गायब, एफ़आईआर पर पाकिस्तान में बवाल

कभी-कभी छोटी-सी घटना भी ऐसा हंगामा खड़ा कर देती है कि बड़े-बड़े मामले पीछे छूट जाते हैं। चंद रुपयों का सामान गायब हुआ और मानो पूरी व्यवस्था अचानक बिजली की रफ्तार से जाग उठी। कार्रवाई इतनी तेज़ हुई कि लोगों ने सोचना शुरू कर दिया—काश हर शिकायत पर यही फुर्ती दिखाई देती। बाहर की दुनिया में करोड़ों के नुकसान पर भी कदम धीमे पड़ जाते हैं, लेकिन यहां मामला अलग ही रंग में नज़र आया। अब बहस इस बात पर है कि न्याय की तराजू किसके लिए भारी है—सामान के लिए, या नाम के लिए?
पाकिस्तान के लाहौर में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने देश की पुलिस, न्याय व्यवस्था और सोशल मीडिया—सबको एक साथ कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक सेशन कोर्ट के जज नूर मुहम्मद बिस्मिल के चैंबर से दो सेब और एक हैंड वॉश चोरी क्या हुए, पूरे लाहौर में कानूनी हलचल मच गई।
जज के रीडर की शिकायत पर इस्लामपुरा पुलिस स्टेशन ने पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 380 के तहत एफ़आईआर दर्ज कर ली। चोरी हुए सामान की कुल कीमत—1,000 पाकिस्तानी रुपए—ने सोशल मीडिया पर तंज़ और तीर दोनों चला दिए।
ड्यूटी ऑफिसर इमरान ख़ान के मुताबिक, मामला सीधे जज के रीडर की ओर से आया था, इसलिए बिना देर किए एफ़आईआर दर्ज कर रिकॉर्ड इनवेस्टिगेशन विंग को भेज दिया गया।
लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि दो सेब और हैंड वॉश पर इतनी तेज़ कार्रवाई और आम जनता की करोड़ों की शिकायतें महीनों तक लंबित—ऐसा दोहरा रवैया क्यों?
सोशल मीडिया पर लोग इस ‘सेब चोरी कांड’ की खुलकर खिल्ली उड़ा रहे हैं।
एक यूज़र ने कहा कि अब शायद “सेब और हैंड वॉश की बरामदगी के लिए जेआईटी भी गठित हो जाएगी।”
दूसरे ने तंज़ कसा—“आम आदमी की करोड़ों की चोरी हो जाए तो एफ़आईआर न मिले, लेकिन जज के दो सेब गायब हों तो पूरा सिस्टम जाग जाता है।”
कुछ यूज़र्स ने इस घटना की तुलना इस्लामाबाद में दो स्कूटर सवार लड़कियों की मौत के मामले से की, जिसमें आरोपी कोर्ट अधिकारी का बेटा था लेकिन कार्रवाई ‘सवालों के घेरे’ में रही।
हालाँकि कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि चोरी चाहे एक रुपए की हो या एक करोड़ की—पुलिस को एफ़आईआर दर्ज करना ही चाहिए। रिटायर्ड आईजी मोहम्मद अल्ताफ़ क़मर के मुताबिक, “रुमाल चोरी हो या मोज़े, पुलिस कार्रवाई के लिए बाध्य है, नहीं तो बड़े अपराध बढ़ेंगे।”
क़ानूनी विशेषज्ञ शकीला सलीम राणा का कहना है—“क़ानून का मानक एक होना चाहिए। यह न्याय बिना भेदभाव सभी को मिलना चाहिए।”
लेकिन सोशल मीडिया के कोलाहल के बीच एक बात साफ़ है—पाकिस्तान में न्याय व्यवस्था की प्राथमिकताएँ और पुलिस की गति पर फिर एक बार बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।




