
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की कमी ~94%
पहाड़ी जिलों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी ~70%
2001: जन्म‑दर ~20.9/1000, मृत्यु‑दर ~7.4/1000
2019: जन्म‑दर ~17.1/1000, मृत्यु‑दर ~6.0/1000
देहरादून: राज्य गठन के 25 वर्षों के बाद भी उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और आपातकालीन सेवाओं की सुस्ती ने कई बार लोगों की जान ले ली है।
हाल ही में अल्मोड़ा के चौखुटिया क्षेत्र में एंबुलेंस नहीं पहुँचने से एक बच्ची की मौत हो गई। वहीं, टिहरी के घनसाली क्षेत्र में प्रसव के बाद एक माह के भीतर लगातार दो महिलाओं की मौत ने स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर स्थिति को उजागर किया। इन घटनाओं के विरोध में अल्मोड़ा और टिहरी में कई दिनों से आंदोलन चल रहे हैं।
अल्मोड़ा से निकली पदयात्रा 3 नवंबर को देहरादून पहुंची, जिसका उद्देश्य मुख्यमंत्री से स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की मांग करना था। लेकिन 4 नवंबर को पुलिस ने पदयात्रा को रोककर कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
राज्य में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) और जिला अस्पतालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन चिकित्सकों और विशेषज्ञों की भारी कमी बनी हुई है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की कमी लगभग 94% तक है, उप-जिला अस्पतालों में 45% और जिला अस्पतालों में 30% तक। पहाड़ी जिलों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी मैदानी क्षेत्रों की तुलना में करीब 70% अधिक है।
25 वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि जन्म‑दर और मृत्यु‑दर में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच और गुणवत्ता अब भी चुनौती बनी हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आपातकालीन सेवाओं में सुधार, एंबुलेंस नेटवर्क का विस्तार, चिकित्सक भर्ती और अस्पतालों की बुनियादी संरचना मजबूत करना जरूरी है। वहीं स्थानीय आंदोलन और पदयात्राओं के माध्यम से जनता अपनी आवाज़ उठाकर प्रशासन पर दबाव बना रही है।
उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की इस स्थिति ने राज्य गठन के समय पहाड़ी जनता में जगी उम्मीदों को अधूरा छोड़ दिया है। अब यह देखना बाकी है कि प्रशासन इन आंदोलनों और घटनाओं के बाद प्रभावी कदम उठाता है या नहीं।
आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच और गुणवत्ता में सुधार की अत्यंत आवश्यकता है।




