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छोटी दिवाली आज : यम दीपक, रूप स्नान और श्री कृष्ण की विजय का पर्व

क्यों जलाए जाते हैं आज 14 दीए, जानिए दीपदान व पूजन की विधि और मुहूर्त

नरक चतुर्दशी पर यम की आराधना, रूप चौदस पर अभ्यंग स्नान और भगवान श्रीकृष्ण के नरकासुर वध की स्मृति में देशभर में उल्लास

देहरादून। आज पूरे देश में छोटी दिवाली का पर्व श्रद्धा, आस्था और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह तिथि नरक चतुर्दशी, रूप चौदस और काली चौदस के नाम से भी जानी जाती है। धार्मिक दृष्टि से यह दिन अत्यंत शुभ माना गया है — कहा जाता है कि इस दिन यमराज की पूजा और दीपदान से मृत्यु भय समाप्त होता है, पापों से मुक्ति मिलती है और घर में सौभाग्य का प्रवेश होता है।

छोटी दिवाली केवल दीप जलाने का दिन नहीं, बल्कि पवित्रता, सुंदरता और संतुलन का प्रतीक पर्व है — जो यमराज के सम्मान, रूप-सौंदर्य की साधना और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर वध की विजय स्मृति को समेटे हुए है।

पूजा व मुहूर्त

  • चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 19 अक्टूबर दोपहर 1:51 बजे
  • चतुर्दशी तिथि समाप्त: 20 अक्टूबर दोपहर 3:44 बजे
  • काली चौदस पूजा मुहूर्त: रात 11:41 से 20 अक्टूबर की मध्यरात्रि 12:31 बजे तक
  • यम दीपक जलाने का शुभ समय: शाम 5:50 से 7:02 बजे तक
  • इस अवधि में मां काली और यमराज की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।

क्यों जलाए जाते हैं 14 दीये?

छोटी दिवाली पर 14 दीपक जलाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। इन दीपों में से एक दीपक यमराज को समर्पित होता है, जिसे मुख्यतः घर के बाहर या दक्षिण दिशा में जलाया जाता है, ताकि अकाल मृत्यु से रक्षा हो।

बाकी दीये भगवान कृष्ण, मां काली, और अन्य देवी-देवताओं को समर्पित होते हैं। ये दीये मुख्य द्वार, पूर्व दिशा, घर के मंदिर, और अन्य पवित्र स्थलों पर जलाए जाते हैं। दीपदान से न केवल धार्मिक लाभ प्राप्त होता है, बल्कि यह घर में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि लाने का प्रतीक भी माना जाता है।

 नरक चतुर्दशी पर यम दीपक जलाने का महत्व

धार्मिक मान्यताओं और गरुड़ पुराण व स्कंद पुराण के अनुसार, नरक चतुर्दशी की रात्रि में यमराज के नाम से दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है।

मान्यता है कि जो व्यक्ति इस दिन संध्या समय में अपने घर के मुख्य द्वार पर सरसों के तेल का दीपक जलाता है, उसे यमदूतों का भय नहीं रहता और जीवन में दीर्घायु व शांति प्राप्त होती है। कहा गया है कि यम दीपक यमराज को प्रसन्न करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें सम्मान देने का प्रतीक है। यह दीपक जीवन और मृत्यु के संतुलन की स्वीकृति का संकेत देता है। जिस घर में श्रद्धा से यह दीप जलाया जाता है, वहां भय और नकारात्मकता का प्रवेश नहीं होता।

रूप चौदस — तन और मन की सुंदरता का पर्व

रूप चतुर्दशी, जिसे रूप चौदस कहा जाता है, आंतरिक और बाहरी सौंदर्य दोनों को निखारने का पर्व है।

धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर अभ्यंग स्नान करने का विधान है। लोग बेसन, हल्दी, चंदन और दूध से बने उबटन को शरीर पर लगाते हैं, तिल के तेल से मालिश करते हैं और यह मंत्र जपते हैं

“ॐ रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।”

यह विधि तन में तेज और मन में प्रसन्नता लाने वाली मानी जाती है। सुबह स्नान के बाद संध्या समय दीपदान का भी विशेष महत्व है — इसे सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना गया है।

अभ्यंग स्नान का धार्मिक और आयुर्वेदिक महत्व

रूप चौदस पर किया गया अभ्यंग स्नान शरीर और मन दोनों को शुद्ध करता है। मान्यता है कि इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, मन शांत होता है और शरीर स्वस्थ रहता है। आयुर्वेद के अनुसार यह स्नान रक्त संचार को सुधारता है, त्वचा को पोषण देता है और तनाव को दूर करता है।

नरकासुर वध की कथा — श्रीकृष्ण की विजय स्मृति

पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में नरकासुर नामक दैत्य को वरदान मिला था कि भूदेवी (पृथ्वी माता) के सिवा कोई उसका वध नहीं कर सकेगा। वरदान के घमंड में वह अत्याचारी बन गया और देवताओं व ऋषियों को सताने लगा।

देवताओं की प्रार्थना पर भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा — जो भूदेवी का ही अवतार थीं — के साथ युद्धभूमि में पहुंचे। युद्ध के दौरान सत्यभामा ने अपने बाण से नरकासुर का वध किया।

यह घटना कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की तिथि को हुई थी, और उसी दिन से इस दिन को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाने लगा।

नरकासुर के वध के बाद जब धरती पर शांति लौटी, तब लोगों ने दीप जलाकर उत्सव मनाया। यही परंपरा आगे चलकर दीपावली के उत्सव का आधार बनी।

छोटी दिवाली का यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन के तीन संदेशों का यम दीपक से मृत्यु पर विजय का सम्मान, रूप चौदस से शरीर-मन की पवित्रता का संदेश और नरकासुर वध से अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है।

 

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