
अहोई माता करती हैं संतान की रक्षा
जब पूजा बन जाए संतान की रक्षा का कवच, जानें क्या है अहोई अष्टमी का महत्व
अहोई’ शब्द का अर्थ है, अनहोनी को होनी में बदलने वाली। इस दिन माताएँ निर्जल व्रत रखकर अपनी संतान की रक्षा, आयु और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। शास्त्रों के अनुसार, “होनी” अर्थात नियति को टाला नहीं जा सकता, परंतु पूजा, व्रत और उपवास की आध्यात्मिक शक्ति से उसकी अशुभता को कम या समाप्त किया जा सकता है। अहोई अष्टमी का व्रत हर साल कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह व्रत खासकर उन माताओं के लिए महत्वपूर्ण है, जो अपनी संतान की खुशहाली, लंबी उम्र और सफलता की कामना करती हैं। सच्चे मन से अहोई अष्टमी का व्रत करने से अवचेतन मन की शक्ति जागृत होती है, जिससे संतान के लिए एक अदृश्य सुरक्षा चक्र निर्मित होता है। माना जाता है कि इस दिन माता अहोई की पूजा करने से संतान के जीवन में सौभाग्य, शिक्षा और करियर में प्रगति सुनिश्चित होती है। माताएँ इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति के साथ रखती हैं, ताकि घर में सुख-समृद्धि और मंगल बना रहे।
व्रत और तिथि
अहोई अष्टमी इस साल 13 अक्टूबर 2025, सोमवार को मनाई जाएगी। इस दिन का शुभ मुहूर्त शाम 5:53 बजे से 7:08 बजे तक है। यह व्रत महिलाओं द्वारा संतान के कल्याण और घर में मंगलकामना के लिए रखा जाता है। साथ ही, यह व्रत उन महिलाओं के लिए भी लाभकारी है जो संतान प्राप्ति की इच्छा रखती हैं।
अहोई माता का महत्व
पद्म पुराण में कार्तिक मास की महिमा का वर्णन किया गया है, इस माह में आने वाले सभी व्रतों का विशेष फल है, अहोई अष्टमी भी इसी मास में मनाया जाने वाला पर्व है जिसका महत्व अत्यधिक गुना बढ़ जाता है। कार्तिक के महीने में करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को संतान की आयु एवं उसके जीवन में आने वाले सभी विघ्न बाधाओं से मुक्ति के लिए अहोई माता का व्रत रखने का विधान है जिसे अहोई अष्टमी व्रत के नाम से जाना जाता है। इस दिन स्त्रियां अहोई माता, जो देवी पार्वती का ही एक रूप हैं, की आराधना करती हैं। यह व्रत मातृत्व के उस दिव्य भाव को व्यक्त करता है, जहां प्रेम, श्रद्धा और संकल्प मिलकर नियति की दिशा तक को परिवर्तित कर देते हैं। अहोई माता की पूजा से संतान के जीवन में खुशहाली और तरक्की आती है। माता की कृपा से घर में सौभाग्य और शांति बनी रहती है। इस दिन महिलाएँ निर्जला उपवास रखती हैं और विशेष पूजा विधि का पालन करती हैं।
पूजा की तैयारियाँ
पूजा की तैयारियों में सबसे पहले दीवार पर अष्टकोष्ठक की अहोई माता की पुतली बनाई जाती है। बच्चों के चित्र भी इसके पास लगाए जा सकते हैं। पूजा के लिए चांदी की बनी स्याहु माला तैयार की जाती है, जिसमें छोटी-छोटी मोतियाँ होती हैं। इसे पूजा के समय माता को अर्पित करना शुभ माना जाता है।
ऐसे करें पूजा
सूर्योदय से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। घर और पूजा स्थल को पवित्र करें और एक लोटा जल लेकर पटले पर कलश की भाँति रखें। माता अहोई की पूजा में रोली, चावल, दूध और भात का प्रयोग करें। हलवा और रुपये (बायना) रखकर माता की कथा सुनें। पूजा के बाद सास-ससुर को बायना दें और आशीर्वाद लें।तारे निकलने पर इस व्रत का समापन होता है। तारों को करवे से अर्घ्य देकर तारों की आरती उतारें। इसके बाद संतान से जल ग्रहण कर, व्रत पूरा करें। अंत में क्षमा प्रार्थना करना न भूलें।
चांद व तारों को देखने का समय
तारों को देखने के लिये समय – 06:17 पी एम
चंद्रोदय का समय – 11:20 पी एम
संतान की शिक्षा और करियर के लिए उपाय
संतान के कल्याण के लिए लाल फूल लेकर उनके करियर और शिक्षा की प्रार्थना करें। संतान को अपने हाथों से दूध-चावल खिलाएँ और लाल फूल उनके हाथों में देकर सुरक्षित रखने को कहें। ऐसा करने से संतान के जीवन में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं।
स्याहु माला का महत्व और पहनने की विधि
स्याहु माला पहनने का महत्व खास है। इसे माता अहोई को अर्पित करके रोली, चंदन और अक्षत छिड़कें, तिलक करें और संतान की लंबी उम्र की कामना करें। इसके बाद माला को उतारकर स्वयं पहनें। इसे पहनने से माता प्रसन्न होती हैं और संतान पर संकट दूर होते हैं।
भूलकर भी न करें ये काम
अहोई अष्टमी के दिन कुछ काम भूलकर भी न करें। नकारात्मक विचार न लाएं, किसी से विवाद न करें और संतान को डांटें नहीं। मिट्टी से संबंधित काम, सिलाई-काटाई, चाकू या कैंची से काम न करें। दूध का सेवन न करें। यदि कोई पशु आपके द्वार पर आए तो उसे मारें नहीं; गाय को गुड़ और चारा देकर प्रणाम करें।
अहोई अष्टमी का व्रत और पूजा संतान की सुरक्षा और घर में मंगल लाने का प्रभावशाली उपाय है। सही विधि से पूजा और स्याहु माला पहनने से माता अहोई की कृपा प्राप्त होती है और संतान के जीवन में खुशियाँ और सफलता आती हैं।




