देहरादून में कल से सजेगा विरासत महोत्सव, जानें क्या होगा खास!
छोलिया नृत्य से होगी विरासत महोत्सव की शुरुआत, देहरादून में पहली बार थिएटर फेस्ट भी

15 दिन तक देश-विदेश के कलाकार बिखेरेंगे कला-संस्कृति के रंग, लोक संगीत से शास्त्रीय प्रस्तुतियों तक सजेगी महफिल
देहरादून। कला, संगीत और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के रंगों से देहरादून एक बार फिर सराबोर होने जा रहा है। विरासत कला एवं धरोहर महोत्सव का 31वां संस्करण 23 अक्टूबर से 6 नवंबर तक आयोजित होगा। नींबूवाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में होने वाले इस आयोजन में देश-विदेश के कलाकार संगीत, नृत्य, लोककला और रंगमंच की प्रस्तुतियों से दर्शकों को रूबरू कराएंगे। इस बार महोत्सव में पहली बार थिएटर फेस्ट भी शामिल किया गया है।
रूरल एंटरप्रेन्योरशिप फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (रीच) की ओर से आयोजित महोत्सव की शुरुआत उत्तराखंड के पारंपरिक छोलिया नृत्य और उप्रेती बहनों की लोक संगीत प्रस्तुति से होगी। उद्घाटन संध्या में पंडित साजन मिश्रा और स्वरांश मिश्रा की शास्त्रीय संगीत प्रस्तुति आकर्षण का केंद्र रहेगी। आयोजन के दौरान हिंदुस्तानी और कर्नाटक शास्त्रीय संगीत, सूफी गायन, गजल, कथक, भरतनाट्यम, ओडिसी और विभिन्न लोक कलाओं की प्रस्तुतियां होंगी।
महोत्सव में बेगम परवीन सुल्ताना, टीएम कृष्णा, जसबीर जस्सी, महेश काले, राहुल देशपांडे, ओसमान मीर और इंडियन ओशन बैंड सहित कई चर्चित कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। उत्तराखंड की गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी लोक संस्कृति के साथ श्रीलंका और कजाकिस्तान के कलाकारों की प्रस्तुतियां भी कार्यक्रम का हिस्सा होंगी। लोक नाट्य ‘चक्रव्यूह’, साहित्यिक सत्र, मुशायरा और कविता से जुड़े आयोजन भी दर्शकों को आकर्षित करेंगे।
महोत्सव में संगीत और नृत्य के अलावा हस्तशिल्प बाजार, पारंपरिक खानपान और शिल्पकारों के उत्पादों को भी स्थान मिलेगा। विद्यार्थियों के लिए रचनात्मक गतिविधियां और कला से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। विंटेज कार एवं मोटरसाइकिल रैली भी महोत्सव के आकर्षण में शामिल होगी।
इस बार आयोजन स्थल में बदलाव के साथ प्रवेश व्यवस्था में भी बदलाव किया गया है। आयोजकों के अनुसार, महोत्सव परिसर में प्रवेश के लिए पहली बार 50 रुपये प्रतिदिन का शुल्क निर्धारित किया गया है। मुख्य सभागार में होने वाले चुनिंदा कार्यक्रमों के लिए अलग टिकट लेना होगा। आयोजकों का उद्देश्य भारतीय कला और सांस्कृतिक परंपराओं को व्यापक मंच उपलब्ध कराने के साथ नई पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ना है।




