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उत्तराखंड का हर बच्चा एक लाख का कर्जदार!

उत्तराखंड पर बढ़ता कर्ज: 25 साल में चार हजार करोड़ से बढ़कर 1.07 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचा राज्य का ऋण

2025–26 में ऋण GSDP का 25 प्रतिशत होने का अनुमान, वित्तीय अनुशासन की दरकार

देहरादून। उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने के साथ ही उस पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2000–01 में जहां राज्य पर करीब ₹4,000 करोड़ का कर्ज था, वहीं वित्त वर्ष 2025–26 तक यह बढ़कर ₹1.07 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है। इन देनदारियों में आंतरिक ऋण (Internal Debt) और बाहरी दायित्व (Other Liabilities) दोनों शामिल हैं।  उत्तराखंड की आबादी लगभग एक करोड़ के आसपास है। इस हिसाब से देखा जाए तो उत्तराखंड का हर व्यक्ति एक लाख रुपए का कर्जदार है।

राज्य वित्त विभाग के अनुमानों के अनुसार, 2025–26 में राज्य का कुल सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) ₹4.29 लाख करोड़ रहेगा, जिसके मुकाबले कुल ऋण लगभग 25 प्रतिशत तक पहुँचने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अनुपात 30 प्रतिशत से ऊपर जाता है, तो ब्याज भुगतान और वित्तीय लचीलापन दोनों पर दबाव पड़ सकता है।


25 वर्षों का ऋण सफर: वर्षवार वृद्धि की कहानी

उत्तराखंड के ऋण का ग्राफ पिछले ढाई दशक में लगातार ऊपर गया है।
राज्य गठन के बाद शुरुआती वर्षों में केंद्र से हस्तांतरित देनदारियों के चलते कुल ऋण करीब ₹4,000 करोड़ रहा। इसके बाद बुनियादी ढांचा और प्रशासनिक खर्च बढ़ने से यह आंकड़ा तेजी से बढ़ा।

वित्त वर्ष 2005–06 में राज्य का कर्ज लगभग ₹9,600 करोड़, 2010–11 में ₹14,700 करोड़, और 2013–14 में ₹22,000 करोड़ तक पहुँच गया। CEIC-RBI के आंकड़ों के अनुसार, 2017–18 में यह बढ़कर ₹41,000 करोड़ हो गया — जिसमें UDAY योजना का योगदान प्रमुख रहा।

कोविड काल में राजस्व घटने और खर्च बढ़ने से राज्य की उधारी पर निर्भरता बढ़ी। 2020–21 तक कुल कर्ज ₹63,000 करोड़, जबकि 2023–24 में यह ₹80,266 करोड़ तक पहुँच गया।
वर्तमान वित्तीय वर्ष 2024–25 (संशोधित अनुमान) के अंत तक यह आंकड़ा ₹93,000 करोड़ रहने का अनुमान है, और आगामी 2025–26 (बजट अनुमान) में यह ₹1.07 लाख करोड़ का स्तर पार कर सकता है।


कर्ज बढ़ने के प्रमुख कारण

  1. बुनियादी ढांचा और विकास निवेश: सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा व ऊर्जा क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पूंजीगत व्यय।
  2. UDAY योजना का भार: बिजली वितरण कंपनियों के घाटे का बोझ राज्य पर आया।
  3. कोविड अवधि का असर: 2020–22 में राजस्व घटने पर बाजार ऋण का सहारा लेना पड़ा।
  4. नए विकास प्रोजेक्ट: पर्यटन, उद्योग और ऊर्जा क्षेत्रों में पूंजीगत निवेश बढ़ा।

विशेषज्ञों की राय और वित्तीय चेतावनी

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य को अपने राजस्व स्रोतों में विविधता लाने और कर्ज प्रबंधन के लिए ठोस रणनीति अपनाने की जरूरत है।
राज्य के ऋण-राजस्व अनुपात को संतुलित रखने के लिए GST संग्रह, पर्यटन शुल्क, खनन कर और सेवा क्षेत्र से आमदनी बढ़ाने पर जोर देना होगा।

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