
देहरादून। राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की रचना को 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आज देशभर में विशेष आयोजन किए गए। इसी क्रम में उत्तरांचल विश्वविद्यालय में इतिहास संकलन समिति के तत्वावधान में एक गोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें वक्ताओं ने वंदे मातरम् के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में वक्ता के रूप में उपस्थित प्रो. (डॉ.) अनिल कुमार दीक्षित ने कहा कि “वंदे मातरम् प्रत्येक भारतीय के लिए प्राण-वायु के समान है।” उन्होंने कहा कि कवि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा बन गया। इसका प्रथम प्रकाशन 7 नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में हुआ, जो बाद में ‘आनंदमठ’ में शामिल होकर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया। यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना जिसने अंग्रेज़ों की नींद उड़ा दी।
गोष्ठी में डॉ. रमेश अग्निहोत्री ने कहा कि राष्ट्रगीत को उसका उचित सम्मान दिलाने में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का योगदान अमूल्य रहा। उन्हीं के प्रयासों से ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त हुआ।
वहीं श्रीमती मीना देवी ने कहा कि हर भारतवासी ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ के समान ही सम्मान देता है, क्योंकि यह गीत हमें देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत कर देता है।
गोष्ठी में विवेक कुमार, हरिशंकर, सुधा देवी, सुधीर अग्रवाल, प्रियंका, सौरभ सिंह सहित कई शिक्षकों और छात्रों ने भाग लिया तथा राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान व्यक्त किया।
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