हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई? संविधान सभा से 1965 के विरोध तक का पूरा इतिहास आया सामने

हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर गोष्ठी में बोले प्रो. अनिल कुमार दीक्षित—हिंदी देश की राजभाषा, जबकि संविधान में किसी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं
देहरादून। हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है और देवनागरी दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपियों में शामिल है। हिंदी को लेकर यह बात देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी के लॉ विभाग के डीन प्रो. अनिल कुमार दीक्षित ने हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर इतिहास संकलन समिति की ओर से आयोजित गोष्ठी में कही। उन्होंने हिंदी के संवैधानिक स्वरूप और राष्ट्रभाषा को लेकर हुए ऐतिहासिक विमर्श पर विस्तार से प्रकाश डाला।
शोध व्याख्यान में प्रो. दीक्षित ने कहा कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली राजभाषा है, जिसका प्रयोग केंद्र के सरकारी कामकाज में किया जाता है। भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि देश में 22 भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान प्राप्त है, जबकि केंद्र के कामकाज में हिंदी और अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाता है।
उन्होंने कहा कि देश के सर्वोच्च न्यायालय और सभी उच्च न्यायालयों में न्यायिक कार्यों की भाषा मुख्य रूप से अंग्रेजी है। संविधान की व्यवस्था के अनुसार सभी भाषाओं का अपना महत्व है और किसी भाषा को दूसरी से कमतर नहीं माना जा सकता। उन्होंने दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के उन राज्यों का भी उल्लेख किया, जहां हिंदी का बोलचाल में इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम है।
प्रो. दीक्षित ने कहा कि भारत में सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषाओं में हिंदी प्रमुख है। यही कारण है कि महात्मा गांधी ने हिंदी को जनमानस से जुड़ी भाषा के रूप में देखा था। उन्होंने बताया कि गांधी ने 1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की वकालत की थी। जवाहरलाल नेहरू भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने के समर्थकों में शामिल थे।
संविधान सभा में भाषा को लेकर हुआ था लंबा मंथन
प्रो. दीक्षित ने बताया कि 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद संविधान निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई तो भाषा का सवाल सबसे महत्वपूर्ण और विवादित मुद्दों में शामिल था। संविधान सभा में इस बात को लेकर लंबी बहस हुई कि देश की राजकीय व्यवस्था में किस भाषा का इस्तेमाल किया जाए और हिंदी को क्या दर्जा दिया जाए।
उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू हिंदुस्तानी भाषा के पक्षधर थे, जिसे हिंदी और उर्दू के मिश्रित स्वरूप के रूप में देखा जाता था। हालांकि, देश के विभाजन के बाद परिस्थितियां बदल गईं और संविधान सभा में हिंदी के स्वरूप को लेकर मतभेद बढ़े। दक्षिण भारत के कई प्रतिनिधियों ने हिंदी को थोपे जाने का विरोध किया।
प्रो. दीक्षित ने इतिहासकार रामचंद्र गुहा की पुस्तक इंडिया आफ्टर गांधी का संदर्भ देते हुए बताया कि मद्रास के प्रतिनिधि टीटी कृष्णामचारी ने हिंदी को लेकर दक्षिण भारत की आशंकाओं को संविधान सभा में मजबूती से रखा था। लंबे विचार-विमर्श के बाद हिंदी को देवनागरी लिपि में केंद्र की राजभाषा स्वीकार किया गया और अंग्रेजी के इस्तेमाल को भी जारी रखने की व्यवस्था की गई।
1965 के बाद भी जारी रहा हिंदी-अंग्रेजी का इस्तेमाल
गोष्ठी में श्रीमती मीना तिवारी ने हिंदी समर्थक नेताओं बालकृष्णन, शर्मा और पुरुषोत्तम दास टंडन के विचारों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि संविधान सभा में कई नेताओं ने अंग्रेजी के वर्चस्व का विरोध किया था।
मीना तिवारी ने कहा कि 1965 में हिंदी के भविष्य को लेकर देश में व्यापक बहस और विरोध देखने को मिला। तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत के कई हिस्सों में हिंदी विरोधी आंदोलन हुए। प्रदर्शन के दौरान हिंदी की पुस्तकों को जलाने और विरोध प्रदर्शनों की घटनाएं भी सामने आईं। इन परिस्थितियों के बाद केंद्र स्तर पर हिंदी के साथ अंग्रेजी के इस्तेमाल को जारी रखने की व्यवस्था बनी।
उन्होंने कहा कि इसी व्यवस्था के चलते हिंदी देश की राजभाषा के रूप में स्थापित रही, लेकिन उसे राष्ट्रभाषा का संवैधानिक दर्जा नहीं मिला।
गोष्ठी में रजत कुमार, डॉ. सागर सक्सेना, रोहन कुमार, श्रीमती प्रियंका शुक्ला, श्रीमती संध्या अग्निहोत्री, अमिय कुमार सहित अन्य लोग मौजूद रहे।




